कागजों की बर्बादी के लिए बड़े-बड़े नामी शैक्षिक संस्थान भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। पाठ्यक्रम में निर्धारित शीर्षकों की सूची छात्र-छात्राओं को दे दी जाती है । सभी छात्र जाते हैं लायब्रेरी में और छाँट -छाँटकर शीर्षक निकालते हैं और फिर शुरू हो जाता है कभी न थमने वाला फोटोस्टेट का दौर जो वर्षपर्यंत सतत चलता रहता है। और प्रोफे्सर इस ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं। इस प्रकार छात्रों के पैसे और असीमित कागजों की बर्बादी साल दर साल होती रहती है साथ प्राणवायु के स्रोत वृक्ष भी दम तोड़ते रहते हैं। यह तो हुई समस्या। अब बात करते हैं समाधान की। पाठयक्रम में निर्धारित विषय विशेष के जितने भी आवश्यक शीर्षक हैं पाठयक्रम निर्माताओं को उस शीर्षक के विशेषज्ञ द्वारा लिखित सामग्रियों को इकठ्ठा कर एक पुस्तक का रूप दे देना चाहिए । इससे प्रत्येक छात्र को विषय से सम्बद्ध ज़रूरी, सटीक एवं प्रामाणिक सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाएगी जिससे वे अनावश्यक फोटोस्टेट नहीं करवाएँगे। क्योकि उनको आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रूप में एक ही पुस्तक में मिल जाएगी। जिसे खुद विषय के शिक्षकों ने तैयार किया है। इस कारण छात्रों के लिए यह बहुत उपयोगी होगी। यदि कोई छात्र अतिरिक्त जानकारी चाहते हैं तो उनके लिए लायब्रेरी में पर्याप्त मात्रा में शिक्षको द्वारा अनुमोदित अतिरिक्त पुस्तकें भी होनी चाहिए। फिर फ़ोटो स्टेट की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।यकीन मानिए बेवजह फोटोस्टेट के कारण करोड़ों पेज़ बर्बाद होते हैं और लाखों पेड़ कटते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के पटेल चेस्ट इलाके में कदम-कदम पर फोटोस्टेट की ऐसी अनेक दुकाने सजी हैं जो दिन रात इस काम को अंजाम देती हैं।और लाखों पेज फोटोस्टेट करती हैं। क्या केंद्रीय शिक्षा मंत्री महोदया को इस सन्दर्भ में कोई कदम उठाना चाहिए ?
SAMAJ AUR SARKAR KI SEEMAON KO SAMAJ KE SAMNE LANA HUM SABKA FARZ HAI.TAKI HUM BHARAT KE BHAVISHYA KO UJJWAL BANANE MEIN SAHYOG DE SAKEN.
शनिवार, 8 नवंबर 2014
जागो जनता जागो !
प्रतिनिधि चुनते समय लहर की बजाय अपने अपने शहर और उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखना अधिक ज़रूरी हैं। एक व्यक्ति बहुत अच्छा है पर ज़रूरी नहीं उनके नाम का सहारा लेने वाला हर व्यक्ति भी उन्हीं की तरह समर्पित हो। दिल्ली के सफाई अभियान को हम इस सन्दर्भ में देख चुके हैं। सहारा लेने वाले व्यक्ति की क्या अपनी कोई उपलब्धि या पहचान नहीं है जिसके आधार पर वो जनता के सामने सिर उठाकर जा सके। जबकि आखिरकार जनता के बीच उसे ही रहना और काम करना है। इस बारे में आम जनता को सोच समझकर फैसला करने की ज़रूरत है। क्योंकि किसी भी फैसले में भावना और बुद्धि का उचित सामंजस्य होना चाहिए। एक तरफ हम भावना में बहकर अपने पैर पर खुद की कुल्हाड़ी मार लेते हैं तो दूसरी तरफ अत्यधिक बुद्धि प्रेरित होना हमें स्वार्थी बनाता है। हम भारतीय लोग भावनाओं में बहुत जल्दी बहकर किसी की बात पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं। पर अब भावना पर बुद्धि का नियंत्रण स्थापित कर उचित निर्णय लेने का वक़्त है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह बात अब समझनी ही होगी अन्यथा हम अपने छोटे छोटे सपनों को यूँ ही मरते देखते रहेंगे।
रविवार, 2 नवंबर 2014
सुखी जीवन
विक्स का सच
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014
दिल्ली में सरकार : एक उलझी पहेली
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014
अरविन्द केजरीवाल : एक अथक पथिक
अरविन्द केजरीवाल :एक योद्धा
उनचास दिनों तक चली अरविंद कि सरकार ने कुछ किया हो या नहीं लेकिन एक बात तो सच है कि आम जनता को जरुर जता दिया कि अगर जनता चाहे तो भ्रष्टाचारियों की नाक में दम कर सकती है , बस चाहिए तो एक सही लीडर। केजरीवाल ने जनता के गुस्से को नेतृत्व दिया और दिल्ली की गद्दी हासिल की. इस उपलब्धि को बहुत हलके में नहीं लेना चाहिए।यह एक बड़े बदलाव की शुरुआत है। इसे आगे ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है। एक अकेले अरविन्द केजरीवाल के बस की ये बात नहीं है। हम केवल आपस में बहस करके भ्रष्ट नेताओं पर अपना गुस्सा निकाल कर रह जाते हैं और अपने-अपने काम में लग जाते हैं। सब ऐसे ही चलता रहता है। हम लाचार होकर मूक बने तमाशा देखते रहते है। क्योंकि भ्रष्ट नेता जानते हैं कि हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तभी हज़ारों आंदोलन अपने अंजाम तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं या शक्ति का प्रयोग करके ख़त्म करवा दिए जाते है। भारत देश की आम जनता को कानून और संविधान की टेक्निकल जानकारी नहीं होती।
इस कारण आम जनता सही जानकारी और तर्कों के साथ अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल नहीं पूछ पाती। जब कोई जानकारी रखने वाला व्यक्ति सत्ता के सच को आम जनता को सरल भाषा में समझाकर जागरूक करने का प्रयास करता है तो राजनीती के गलियारों में खलबली मच जाती है। जनता की समझ को सीमित रखने में अंग्रेजी भाषा का भी अहम् योगदान है। सभी अहम् जानकारियाँ अदालतों के फैसले अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो पाते हैं। अब आम जनता को अपनी मातृभाषा तक में पढ़ने का सही मौका नहीं मिल पा रहा तो फिर अंग्रेजी सीखने -सिखाने की किसे फिक्र है? केजरीवाल ने जो शुरुआत की है वो बिलकुल सही है। परन्तु कुछ कमियां भी हैं। जैसे - मीडिया से रुबरु होने वाले प्रवक्ता कई बार भावावेश में आकर ऐसी बात कह जाते हैं जिससे विरोधियों के निशाने पर आ जाते हैं, कोई भी प्रवक्ता कभी भी कुछ भी बोल देता है फिर बाद में माफ़ी माँग लेता है , आंदोलन में शामिल लोगों के बिजली के बिलों में आधी कटौती करने का फैसला भी गलत है, क्योंकि पार्टी को वोट तो लाखों ने दिया था फिर सबके बिलों में कटौती होनी चाहिए थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिल्ली के स्टूडेंट्स को आरक्षण का फैसला भी सही नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ऐसे कदम से पार्टी की राष्ट्रीय सोच प्रकट नहीं होती है। सभी अस्थायी कर्मियों को तुरंत स्थायी करने का आश्वासन देना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दिल्ली के स्कूलों में कार्य के घंटे बढ़ाने का कदम भी उचित नहीं कहा जा सकता। हालाँकि RTE. में इसका प्रावधान है ऐसा कहा जाता है। लेकिन ज़रूरी यह है कि सरकारी स्कूलों में भी पब्लिक स्कूल जैसी सुविधाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाए।
काम के घंटे बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं है। इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। मानसिक थकान ज्यादा होने से उनकी रचनात्मक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इन सब बातों का ध्यान केजरीवाल को भविष्य में रखना चाहिए। इस्तीफा देने के बाद इन बातों पर गौर करना बहुत ज़रूरी है कि आप राजनीती में थोड़ी चाणक्यनीति भी मिलाये और ऐसे लोगों को पार्टी का प्रवक्ता बनाये जोकि तर्क देने में ,बोलने में माहिर हों , भाषण शैली प्रभावशाली हो। जिनके बोलने में धाराप्रवाहिता हो ,जोश हो। जिनकी भाषा पैनी हो।
यह सब गुण भी टिके रहने और अपना काम ईमानदारी से करने के लिए ज़रूरी हैं।बोलने की कला में ही BSP. उत्तर प्रदेश में पीछे रह गई हज़ारों बेघरों को मकान देने, अपराधियों पर लगाम लगाने के बावजूद मूर्तियां बनवाने का मुद्दा विरोधियों ने खूब उछाल दिया और BSP. के नेता सही जवाब नहीं दे पाये। और मात्र लैपटॉप का वादा करके सपा ने अपनी सरकार बना ली।
अरविंदजी , आपका इस्तीफ़ा देने का फैसला बिलकुल सही है। समर्थन की बैसाखी से जनलोकपाल का एवरेस्ट फतह नहीं किया जा सकता।
भविष्य की सफलताओं के लिए मेरी शुभकामनाएं।
रविवार, 8 दिसंबर 2013
बदलाव की धारा
मंगलवार, 5 नवंबर 2013
सोमवार, 28 अक्टूबर 2013
सहायक आचार्य :
रविवार, 29 सितंबर 2013
जनता की भाषा और भारत की तरक्की
भारत के विकास कि सबसे बड़ी बाधा है. लोगों की मातृभाषा की बजाय अंग्रेजी भाषा में महत्त्वपूर्ण जानकारी का उपलब्ध होना .जब लोगों को जानकारी ही नहीं होगी .तो वो भला किससे और किस हक की बात कर पाएंगे?
CTET : CERTIFICATE :
CBSE द्वारा आयोजित CTET परीक्षा के अंक पत्र पर परीक्षार्थी की जाति का उल्लेख नहीं होना चाहिए.इससे समाज में जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा. जाति का दंभ करने वाले लोग आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को हीन या दयादृष्टि से देखने लगेंगे. वह व्यक्ति चाहे जितना ही प्रतिभावान क्यों न हो ,जैसे ही लोगों को उसकी जाति का पता चलता है लोग फ़ौरन उसकी प्रतिभा पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं. कि "अच्छा ! कोटे से हो ? तभी यहाँ तक पहुँच गए".इस तरह के जुमले सुनकर आरक्षित वर्ग का व्यक्ति अपमानित होकर रह जाता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है .किसी अन्य योग्यता परीक्षा या अन्य किसी परीक्षा के प्रमाणपत्रों पर व्यक्ति की जाति का उल्लेख नहीं होता है. CBSE को भी इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिए. नियुक्ति करने वाले संस्थान पर जाति का सत्यापन छोड़ देना चाहिए. जिससे कि जातिवाद का अनुसरण करने वाले लोगों को किसी की प्रतिभा पर प्रश्न चिह्न लगाने और उसे घडी-घडी अपमानित करने का अवसर प्राप्त न हो सके.
शनिवार, 22 जून 2013
शुक्रवार, 21 जून 2013
'आपदा का फायदा उठाने वाले मनुष्यरूपी जानवर'