शनिवार, 8 नवंबर 2014

कागजों की बर्बादी

कागजों की बर्बादी के लिए बड़े-बड़े नामी शैक्षिक संस्थान भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। पाठ्यक्रम में निर्धारित शीर्षकों की सूची छात्र-छात्राओं को दे दी जाती है । सभी छात्र जाते हैं लायब्रेरी में और छाँट -छाँटकर शीर्षक निकालते हैं और फिर शुरू हो जाता है कभी न थमने वाला फोटोस्टेट का दौर जो वर्षपर्यंत सतत चलता रहता है। और प्रोफे्सर इस ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं। इस प्रकार छात्रों के पैसे और असीमित कागजों की बर्बादी साल दर साल होती रहती है साथ प्राणवायु के स्रोत वृक्ष भी दम तोड़ते रहते हैं। यह तो हुई समस्या। अब बात करते हैं समाधान की। पाठयक्रम में निर्धारित विषय विशेष के जितने भी आवश्यक शीर्षक हैं पाठयक्रम निर्माताओं को उस शीर्षक के विशेषज्ञ द्वारा लिखित सामग्रियों को इकठ्ठा कर एक पुस्तक का रूप दे देना चाहिए । इससे प्रत्येक छात्र को विषय से सम्बद्ध ज़रूरी, सटीक एवं प्रामाणिक सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाएगी जिससे वे अनावश्यक फोटोस्टेट नहीं करवाएँगे। क्योकि उनको आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रूप में एक ही पुस्तक में मिल जाएगी। जिसे खुद विषय के शिक्षकों ने तैयार किया है। इस कारण छात्रों के लिए यह बहुत उपयोगी होगी। यदि कोई छात्र अतिरिक्त जानकारी चाहते हैं तो उनके लिए लायब्रेरी में पर्याप्त मात्रा में शिक्षको द्वारा अनुमोदित अतिरिक्त पुस्तकें भी होनी चाहिए। फिर फ़ोटो स्टेट की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।यकीन मानिए बेवजह फोटोस्टेट के कारण करोड़ों पेज़ बर्बाद होते हैं और लाखों पेड़ कटते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के पटेल चेस्ट इलाके में कदम-कदम पर फोटोस्टेट की ऐसी अनेक दुकाने सजी हैं जो दिन रात इस काम को अंजाम देती हैं।और लाखों पेज फोटोस्टेट करती हैं। क्या केंद्रीय शिक्षा मंत्री महोदया को इस सन्दर्भ में कोई कदम उठाना चाहिए ?

जागो जनता जागो !

प्रतिनिधि चुनते समय लहर की बजाय अपने अपने शहर और उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखना अधिक ज़रूरी हैं। एक व्यक्ति बहुत अच्छा है पर ज़रूरी नहीं उनके नाम का सहारा लेने वाला हर व्यक्ति भी उन्हीं की तरह समर्पित हो। दिल्ली के सफाई अभियान को हम इस सन्दर्भ में देख चुके हैं। सहारा लेने वाले व्यक्ति की क्या अपनी कोई उपलब्धि या पहचान नहीं है जिसके आधार पर वो जनता के सामने सिर उठाकर जा सके। जबकि आखिरकार जनता के बीच उसे ही रहना और काम करना है। इस बारे में आम जनता को सोच समझकर फैसला करने की ज़रूरत है। क्योंकि किसी भी फैसले में भावना और बुद्धि का उचित सामंजस्य होना चाहिए। एक तरफ हम भावना में बहकर अपने पैर पर खुद की कुल्हाड़ी मार लेते हैं तो दूसरी तरफ अत्यधिक बुद्धि प्रेरित होना हमें स्वार्थी बनाता है। हम भारतीय लोग भावनाओं में बहुत जल्दी बहकर किसी की बात पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं। पर अब भावना पर बुद्धि का नियंत्रण स्थापित कर उचित निर्णय लेने का वक़्त है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह बात अब समझनी ही होगी अन्यथा हम अपने छोटे छोटे सपनों को यूँ ही मरते देखते रहेंगे।

रविवार, 2 नवंबर 2014

सुखी जीवन

अपनी आदतों को सही करके अपने भाग्य के ग्रहों को बदले- [१] मुख्य द्वार के पास कभी भी कूड़ादान ना रखें इससे पड़ोसी शत्रु हो जायेंगे | [२] सूर्यास्त के समय किसी को भी दूध,दही या प्याज माँगने पर ना दें इससे घर की बरक्कत समाप्त हो जाती है | [३] छत पर कभी भी अनाज या बिस्तर ना धोएं..हाँ सुखा सकते है इससे ससुराल से सम्बन्ध खराब होने लगते हैं | [४] फल खूब खाओ स्वास्थ्य के लिए अच्छे है लेकिन उसके छिलके कूडादान में ना डालें वल्कि बाहर फेंकें इससे मित्रों से लाभ होगा | [५] माह में एक बार किसी भी दिन घर में मिश्री युक्त खीर जरुर बनाकर परिवार सहित एक साथ खाएं अर्थात जब पूरा परिवार घर में इकट्ठा हो उसी समय खीर खाएं तो माँ लक्ष्मी की जल्दी कृपा होती है | [६] माह में एक बार अपने कार्यालय में भी कुछ मिष्ठान जरुर ले जाएँ उसे अपने साथियों के साथ या अपने अधीन नौकरों के साथ मिलकर खाए तो धन लाभ होगा | [७] रात्री में सोने से पहले रसोई में बाल्टी भरकर रखें इससे क़र्ज़ से शीघ्र मुक्ति मिलती है और यदि बाथरूम में बाल्टी भरकर रखेंगे तो जीवन में उन्नति के मार्ग में बाधा नही आवेगी | [८] वृहस्पतिवार के दिन घर में कोई भी पीली वस्तु अवश्य खाएं हरी वस्तु ना खाएं तथा बुधवार के दिन हरी वस्तु खाएं लेकिन पीली वस्तु बिलकुल ना खाएं इससे सुख समृद्धि बड़ेगी | [९] रात्रि को झूठे बर्तन कदापि ना रखें इसे पानी से निकाल कर रख सकते है हानि से बचोगें | [१०] स्नान के बाद गीले या एक दिन पहले के प्रयोग किये गये तौलिये का प्रयोग ना करें इससे संतान हठी व परिवार से अलग होने लगती है अपनी बात मनवाने लगती है अतः रोज़ साफ़ सुथरा और सूखा तौलिया ही प्रयोग करें | [११] कभी भी यात्रा में पूरा परिवार एक साथ घर से ना निकलें आगे पीछे जाएँ इससे यश की वृद्धि होगी | ऐसे ही अनेक अपशकुन है जिनका हम ध्यान रखें तो जीवन में किसी भी समस्या का सामना नही करना पड़ेगा तथा सुख समृद्धि बड़ेगी | जो भी मित्र अपनी कुंडली की जानकारी बिना किसी रत्न केचाहते हैं वो अपना जन्म तारीख समय और जिला का नाम भेजे अपनी श्रद्धा अनुसार दक्षिणा दे और उसका समाधान आयुर्वेद योग वास्तु रंग भोजनऔर व्यवहार द्वारा प्राप्त करने के लिए संपर्क करे 09334913911 --- via #MMSSamvaad

विक्स का सच

सुबह का नमस्कार मित्रों मित्रो भारत मे एक विदेशी कंपनी हैं प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी )| जो भारत मे vicks vaporub नाम की एक दवा बेचती है | क्या आप जानते हैं VICKS नाम की दावा अमेरिका में बनाना और बेचना दोनों जुर्म है | WHO (world health organisation ) ने खुद इसे जहर घोषित किया है | आप google पर भी " vicks vaporub banned " लिख कर search कर सकते हैं | https://www.google.co.in/#q=vicks+vaporub +banned+by+who बच्चे को खांसी आई नहीं कि उसके गले पर या तो विक्स मल दी गई या फिर उसे विक्स की गोली चूसने को दे दी गई। लेकिन अब विक्स का इस्तेमाल न करें। अमेरिका मे अगर किसी डॉक्टर ने किसी को VICKS vaporub की prescription लिख दे तो उस डॉक्टर को 14 साल की जेल हो जाती है, उसकी डिग्री छीन ली जाती है क्यूंकि की vicks vaporub जहर है, ये आपको दमा, अस्थमा, ब्रोंकिअल अस्थमा कर सकता है | इसीलिए दुनिया भर में WHO और वैज्ञानिको ने इसे जहर घोषित किया और ये जहर भारत में सबसे ज्यादा बिकता है विज्ञापनो की मदद से | लेकिन क्या आप जानते हैं ? भारत मे एक कानून है ? उस कानून के अनुसार किसी भी दवा का विज्ञापन टीवी, अखबार, या किसी भी मैगजीन पे नही दिया जा सकता ; लेकिन इसके बावजूद भी पैसे के ताकत से, घूसख़ोरी से ये सब होता है और दवाईयों के विज्ञापन लगातार टीवी, अखबारों आदि मे दिखाये जाते हैं | इस प्रोडक्ट को बनाने वाली कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी) ने अमेरिका में अपनी इस दवा को वापस ले लिया है यानी कंपनी इस दवा को अब अमेरिकन बाजार में नहीं बेचेगी। इस कंपनी ने सिर्फ विक्स ही नहीं बल्कि अपना एक और प्रॉडक्ट 24 लिक्वि कैप्स बोनस पैक भी वापस ले लिया है। पर...भारत समेत दुनिया के विकासशाली देशों यानी गरीब देशों में दोनों दवाओं को वापस नहीं लिया गया। क्यों वापस लिया विक्स को प्रॉक्टर एंड गैंबल (Procter and Gamble)ने अपनी प्रेस रिलीज में कहा है कि इस दवा को इसके दावे के अनुरूप नहीं पाया गया। कंपनी ने विक्स (Vicks) के पैकेट पर लिखा था कि यह दवा १२ साल से कम उम्र के बच्चों पर काफी तेजी से असर करती है लेकिन कंपनी ने पाया कि ऐसा नहीं है। इसका असर बच्चों पर नहीं होता। ठीक यही नतीजा क्वि कैप्स के साथ भी निकला । कंपनी ने अपनी रिलीज में यह भी कहा कि उसने खुद ही पहल करते हुए दोनों दवाओं को वापस लिया है। यानी उसने पहल को भी अमेरिकन लोगों के बीच भुनाने का पूरा इंतजाम किया है। संकेत यह देने की कोशिश की जा रही है कि यह कंपनी कितनी ईमानदार है कि इसने अपने दो प्रोडक्ट बेहतर नतीजे न आने पर वापस ले लिए । हकीकत यह है कि अमेरिका में फूड एंड ड्रग कंट्रोलर अथॉरिटी के नियम इतने कड़े हैं कि उसके आगे कंपनियों के दावों की असलियत खुल जाती है । यह अथॉरिटी ऐसी दवाओं और वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाते देर नहीं करती । इसके अलावा वहां इस क्षेत्र में कई एनजीओ भी सक्रिय हैं जो लगातार ऐसी वस्तुओं पर नजर रखते हैं और अथॉरिटी को सूचना देते रहते हैं। वैसे भी वहां की अथॉरिटी की वेबसाइट पर जाकर कोई भी आदमी किसी भी प्रोडक्ट की शिकायत कर सकता है । मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के बाद भारत जिस अमेरिकी गुलामी की तरफ बढ़ रहा है, प्रॉक्टर एंड गैंबल की घटना उसकी जीती जागती मिसाल है। यह अमेरिकी कंपनी है और करीब 80 देशों में इसकी शाखाएं हैं यानी वहां भी पी एंड जी की यूनिट है जो इस फॉर्मूले के आधार पर विक्स और 24 लिक्वि कैप्स बनाती है। इन 80 देशों की शाखाओं में करीब 1 लाख 35 हजार लोग नौकरी करते हैं । भारत में इस समय हर छोटी से लेकर बड़ी जिस भी चीज का इस्तेमाल आप करते हैं, उनमें कहीं न कहीं किसी भी रूप में अमेरिकन हस्तक्षेप बरकरार है । यानी टाटा नमक की तरह अमेरिका हमारे हर निवाले में मौजूद है। खासकर दवाओं के मामले में तो यह आश्चर्यजनक ढंग से मौजूद है। याद कीजिए टीवी पर आपने जब पहली बार विक्स का विज्ञापन देखा था तो वह क्या था – गले में खिचखिच...विक्स की गोली लो खिचखिच दूर करो । कितना आकर्षित करता था यह विज्ञापन आपको । लेकिन अब जब उसकी असलियत सामने आई है तो हम लोग मुंह चुराने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। विक्स को वापस लेने की खबर अमेरिकन मीडिया से मिली है, भारतीय मीडिया में यह खबर नजर नहीं आई है। हो सकता है कि एकाध अंग्रेजी अखबारों ने इसे कहीं संक्षेप में लगाया भी हो। कहने का आशय यह है कि भारत के एक बहुत बड़े वर्ग तक यह खबर कभी नहीं पहुंच पाएगी कि विक्स और 24 लिक्वि कैप्स अब अमेरिका में नहीं बेची जाएगी। लोग हमेशा की तरह खिचखिच दूर भगाने के लिए विक्स खाते रहेंगे । नाम में फर्क - अमेरिका में विक्स को विक्स डे क्विल कोल्ड एंड फ्लू के नाम से बेचा जाता है। भारत में यह विक्स वेपोरब, विक्स कफ ड्रॉप्स, विक्स एक्शन 500 प्लस के नाम से बेचा जाता है। पी एंड जी के जो अन्य पॉपुलर प्रॉडक्ट पूरी दुनिया में बिकते हैं वे हैं- पैंपर्स, टाइड, एरियल, आलवेज, विहस्पर, पैंटीन, मैच 3, बाउंटी, डॉन, गेन, प्रिंगेल्स, चारमिन, डाउनी, लेनोर, इयाम्स, क्रेस्ट, ओरल-बी, ड्यूरासेल, ओले, हेड एंड शोल्डर, वेल्ला, जिलेट आदि। इनमें से आपने जरूर किसी न किसी प्रोडक्ट का इस्तेमाल भारत में भी किया होगा । कोई एक दवा नहीं - विक्स या 24 लिक्वि कैप्स कोई एक दवा नहीं है जिसका अमेरिकी चेहरा अलग है और भारत जैसे गरीब देशों के लिए उसका पैमाना अलग है। तमाम ऐसी प्रतिबंधित दवाएं जो अमेरिका में नहीं बेची जा सकतीं, वह भारत में खुलेआम बिकती हैं। यहां के डाक्टर दवा कंपनियों से गिफ्ट और टूर के कूपन लेकर उन दवाओं को खरीदने की सिफारिश (रेकमेंड) करते हैं । सिफला एक भारतीय कंपनी है। अभी जब स्वाइन फ्लू फैला तो उसने एक बहुत ही कारगर दवा टेमीफ्लू भारतीय मार्केट में उतारी। चूंकि स्वाइन फ्लू सबसे पहले अमेरिका में फैला तो वहां की सरकार ने सबसे पहले वहां की कंपनियों से स्वाइन फ्लू की दवा के बारे में पड़ताल की। सभी ने हाथ खड़े कर दिए। सिफला ने अमेरिकन सरकार को बताया कि उसके पास बहुत ही कारगर दवा है। अमेरिका ने सिफला को दवा सप्लई का आर्डर दे दिया। वहां दवा पहुंचने की देर थी कि एक अमेरिकन कंपनी ने इससे मिलती-जुलती दवा बनाकर पेटेंट का दावा कर दिया। खैर वह केस सिफला ने जीता और अब टेमीफ्लू के मामले में उसका डंका बज रहा है। यहां भारत में टेमीफ्लू की सप्लाई के लिए सिफला को भारत सरकार से बार-बार गुहार लगानी पड़ी कि हमारी दवा खरीद लो और पब्लिक में बांट दो। यह उदाहरण मैंने सिर्फ इसलिए दिया कि अगर किसी अमेरिकी कंपनी को भारत सरकार के पास यह दवा बेचनी होती तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनीसेफ, रोटरी क्लब जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उसकी पैरोकारी में उतर आतीं। लेकिन सिफला की पैरोकारी किसी ने नहीं की, यहां तक कि भारतीय मीडिया ने भी नहीं। न यहां न वहां । जुकाम और सिरदर्द के इलाज में काम आने वाली दवा विक्स वैपोरब बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है। एमएसएनबीसी अध्ययन रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है।शारीरिक सुकून के लिए नाक और तलवे में विक्स वैपोरब रगड़ा जाता है। एमएसएनबीसी न्यूज नेटवर्क की इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि यह दवा बच्चों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। इससे बच्चों के शरीर के उस हिस्से में जलन हो सकती है जहां विक्स वैपोरब दवा लगाई जाती है। इस मरहम से बच्चों में सांस संबंधी जटिलाएं पैदा हो सकती हैं। इससे श्लेश्म झिल्ली पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। उत्तरी कैरोलिना में वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसीन के बाल रोग विभाग के उप प्रमुख ब्रुस के। रूबिन को इस रिपोर्ट में यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, छोटे बच्चे के लिए यह दवा अति संवेदनशील साबित हो सकती है। इससे बच्चों की सांस नली सिकुड़ सकती है। कई मामले में यह मरहम सांस नली को खतरनाक तरीके से जाम कर सकता है। उनका मानना है कि यह मरहम लोगों में यह गलतफहमी पैदा कर देती है कि उनकी सांस नली पूरी तरह साफ हो गई है, पर ऐसा होता नहीं है। इस मरहम में मेंथॉल नामक रसायन होता है। vicks पेट्रोलियम जेल्ली से बनता है जिसकी कीमत ६०-७० रुपया किलो है और विक्स की बिक्री में procter and gamble कंपनी को २०,००० % से जादा का मुनाफा है | ये मुनाफा आप की जेब से लूटा जा रहा है और सरकार इस घोटाले में शामिल है | सरकार ने लाइसेन्स दे रखी है, आँखे बंद कर रखी है और कंपनी देश को लूटा जा रहा है और ये vicks vaporub नाम की दवा कितनी महंगी आपको बेची जाती है | २५ ग्राम ४० रूपये की है तो ५० ग्राम ८० रूपये की तो १०० ग्राम १६० रूपये की मतलब १ किलो vicks की १६०० रूपये हुई | १६०० रूपये किलो का जहर खरीद आप खुद लगा रहे हैं और अपने बच्चों को लगा रहे हैं | जिससे आपको दमा, अस्थमा, ब्रोंकिअल अस्थमा TB हो सकता है | सर्दी खांसी की आयुर्वेद मे बहुत अच्छी दवा है उसका नाम है | दालचीनी (ध्यान रहे ये दालचीनी आम घरो मे होने वाली आम दाल और चीनी नहीं है ) http://hi.wikipedia.org/wiki/दालचीनी | इस दालचीनी को पीस ले और एक चम्मच शहद के ऊपर कुछ चुटकी डाले और सीधा निगल जाएँ बहुत ही ज्यादा लाभकारी हैं | अगर किसी को गले मे ज्यादा दर्द हो या tonsils की समस्या हो तो आप एक चुटकी शुद्ध हल्दी बिलकुल गले मे घंटी की पास रखे मात्र 3 दिन करने से आपको बहुत अधिक लाभ होगा | और अगर आपको गले की खिचखिच दूर ही करनी है तो गरम पानी में तुलसी, अदरक और मामूली सा नमक डालकर उसका गलाला करें और उस पानी को पी लें। आपकी खिचखिच जरूर दूर हो जाएगी । इस vicks नाम के जहर को घर से बाहर फेंके और RTI माध्यम से सरकार से सवाल करे की अगर ये अगर अमेरिका मे ban है तो भारत मे क्यूँ बिक रही है | एक भाई ने २८ जनवरी २०१३ को RTI की website पर सवाल भी पूछा था लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया | http://www.rtiindia.org/forum/109125-rti-vicks- vaporub-p-g-banned-worldwide.html आपने पूरी post पढ़ी बहुत बहुत धन्यवाद १. http://www.youtube.com/watch?v=ZH9KSgJK oQE २. http://www.hoaxorfact.com/Health/ban-vicks- save-life.html ३. http://www.bluelight.org/vb/threads/133538- The-More-You-Know-How-much-Vicks-Vaporub- would-it-take-to-kill-a-man ४. http://www.scientificamerican.com/blog/post/ warning-vicks-vaporub-bad-for-tots-2009-01-12/ ?id=warning-vicks-vaporub-bad-for-tots-2009-01 -12 --- via #NavyugSamvaad --- via #MMSSamvaad

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

दिल्ली में सरकार : एक उलझी पहेली

दिल्ली में कब सरकार बनेगी ? पता नहीं । कौन दल बनाएगा?  पता नहीं। राष्ट्रपति शासन की अवधि उम्मीद से लम्बी हो गई है। बीजेपी अपने पक्ष में माहौल बनाने का पूरा प्रयास कर रही है। छठ का अवकाश घोषित करना , 84 के दंगा पीड़ितों को मुवावजे के तौर पर 5-5 रु लाख देने की घोषणा करना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।  इसके बावजूद दिल्लीवासियों को मतदान के वक्त इन प्रभावों को स्वयं पर हावी नहीं होने देना चाहिए। एक सजग और सतर्क मतदाता ही स्वस्थ्य लोकतंत्र का आधार है। मतदान करते समय क्षणिक प्रलोभनों के अपेक्षा भावी 5 वर्षों को ध्यान में रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

अरविन्द केजरीवाल : एक अथक पथिक

अरविन्द केजरीवाल :एक योद्धा

उनचास दिनों तक चली अरविंद कि सरकार ने कुछ किया हो या नहीं लेकिन एक बात तो सच है कि आम जनता को जरुर जता दिया कि अगर जनता चाहे तो भ्रष्टाचारियों की  नाक में दम कर सकती है , बस चाहिए तो एक सही लीडर। केजरीवाल ने जनता के गुस्से को नेतृत्व दिया और दिल्ली  की गद्दी हासिल की. इस उपलब्धि को बहुत हलके में नहीं लेना चाहिए।यह एक बड़े बदलाव की  शुरुआत है। इसे आगे ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है। एक अकेले अरविन्द केजरीवाल के बस की  ये बात नहीं है। हम केवल आपस में बहस करके भ्रष्ट नेताओं पर अपना गुस्सा निकाल कर रह जाते हैं  और अपने-अपने काम में लग जाते हैं। सब ऐसे ही चलता रहता है। हम लाचार होकर मूक बने तमाशा देखते रहते है। क्योंकि भ्रष्ट नेता जानते हैं कि हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तभी हज़ारों आंदोलन अपने अंजाम तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं या शक्ति का प्रयोग  करके ख़त्म करवा दिए जाते है। भारत देश  की आम जनता को कानून और संविधान की टेक्निकल जानकारी नहीं होती।

 इस कारण आम जनता सही जानकारी और तर्कों के साथ अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल नहीं पूछ पाती। जब कोई जानकारी रखने वाला व्यक्ति सत्ता के सच को आम जनता को सरल भाषा में समझाकर जागरूक करने का प्रयास करता है तो राजनीती के गलियारों में खलबली मच जाती है। जनता की समझ को सीमित रखने में अंग्रेजी भाषा का भी अहम् योगदान है। सभी अहम् जानकारियाँ अदालतों के फैसले अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो पाते हैं। अब आम जनता को अपनी मातृभाषा तक में पढ़ने का सही मौका नहीं मिल पा रहा तो फिर अंग्रेजी सीखने -सिखाने की  किसे फिक्र है?  केजरीवाल ने जो शुरुआत की है वो बिलकुल सही है। परन्तु कुछ कमियां भी हैं।  जैसे - मीडिया से रुबरु होने वाले प्रवक्ता कई बार भावावेश में आकर ऐसी बात कह जाते हैं जिससे विरोधियों के निशाने पर आ जाते हैं, कोई भी प्रवक्ता कभी भी कुछ भी बोल देता है फिर बाद में माफ़ी माँग लेता है , आंदोलन में शामिल लोगों के बिजली के बिलों में आधी कटौती करने का फैसला भी गलत है, क्योंकि पार्टी को वोट तो लाखों ने दिया था फिर सबके बिलों में कटौती होनी चाहिए थी। दिल्ली  यूनिवर्सिटी में दिल्ली के स्टूडेंट्स को आरक्षण का फैसला भी सही नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ऐसे कदम से पार्टी की राष्ट्रीय  सोच प्रकट नहीं होती है। सभी अस्थायी कर्मियों को तुरंत स्थायी करने का आश्वासन देना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दिल्ली के स्कूलों में कार्य के घंटे बढ़ाने का कदम भी उचित नहीं कहा जा सकता। हालाँकि RTE. में इसका प्रावधान है ऐसा कहा जाता है। लेकिन ज़रूरी यह है कि सरकारी स्कूलों में भी पब्लिक स्कूल जैसी सुविधाओं की  उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाए।

काम के घंटे बढ़ाना  समस्या का  समाधान नहीं है।  इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। मानसिक थकान ज्यादा होने से उनकी रचनात्मक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इन सब बातों का ध्यान केजरीवाल को भविष्य में रखना चाहिए। इस्तीफा देने के बाद इन बातों पर गौर करना बहुत ज़रूरी है कि आप राजनीती में थोड़ी चाणक्यनीति भी मिलाये और ऐसे लोगों को पार्टी का प्रवक्ता बनाये जोकि तर्क देने में ,बोलने में माहिर हों , भाषण शैली प्रभावशाली हो। जिनके बोलने में धाराप्रवाहिता हो ,जोश हो। जिनकी भाषा पैनी हो।

 यह सब गुण भी टिके रहने और अपना काम ईमानदारी से करने के लिए ज़रूरी हैं।बोलने की  कला में ही BSP. उत्तर प्रदेश  में पीछे रह गई  हज़ारों बेघरों को मकान देने, अपराधियों पर लगाम लगाने के बावजूद  मूर्तियां बनवाने का मुद्दा विरोधियों ने  खूब उछाल दिया और BSP. के नेता सही जवाब नहीं दे पाये। और   मात्र लैपटॉप का वादा करके सपा ने अपनी सरकार  बना ली।

 अरविंदजी , आपका इस्तीफ़ा देने का फैसला बिलकुल  सही है। समर्थन की  बैसाखी से जनलोकपाल का एवरेस्ट फतह नहीं किया जा सकता। 

भविष्य की सफलताओं के लिए मेरी शुभकामनाएं।

 

रविवार, 8 दिसंबर 2013

बदलाव की धारा

        बदलाव का आगाज़ 
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिला जनसमर्थन किसी बड़े राजनीतिक 
बदलाव की ओर संकेत है।  ये इस बात की ओर इशारा है कि अभी तक जनता दो में से किसी एक को ही चुनती आ रही थी , चाहे उसे दोनों पसंद  हो या नहीं। क्योंकि जनता के पास अन्य ईमानदार विकल्प ही मौजूद नहीं थे। लेकिन जैसे ही उसे विकल्प मिला उसने (जनता ने) अपनी वास्तविक इच्छा जाहिर कर दी। दिल्ली का चुनाव परिणाम इस दृष्टि से भी महत्त्व पूर्ण है कि न्यूनतम साधनों से भी अधिकतम परिणाम  प्राप्त किये जा सकते हैं। चुनावों में बढ़ते धन और बल के प्रभाव के बीच आम आदमी पार्टी की शानदार उपस्थिति राजनीति को एक नयी दिशा देती है।
जो जनता खुले तौर पर अपना गुस्सा प्रकट नहीं कर पा रही थी उसे अपने गुस्से की अभिव्यक्ति के लिए एक विकल्प मिल गया है। उम्मीद है यह बदलाव ईमानदार और ईमानदारी को साथ लेकर चलते हुए दिल्ली से आगे राष्ट्रीय स्तर पर  भी व्यापक जनसमर्थन जुटाते हुए एक नए भारत का निर्माण करेगा।  आज भारत इंडिया और भारत में बँट गया है।  एक शासक और दूसरा शासित की भूमिका में है। दोनों के बीच दूरी बढ़ती ही जा रही है। आज इस दूरी को समाप्त करने की ज़रूरत है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी भारत शिक्षा,स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर भी काबू नहीं कर पाया क्योंकि देश में जो विकास हुआ वह देश केंद्रित कम और चुनाव केंद्रित ज्यादा रहा। यह हम सभी जानते है कि देश केंद्रित विकास चुनाव के पांचों वर्ष सामान रूप से चलता रहता है जबकि चुनाव केंद्रित विकास चुनाव के नजदीक आते ही शुरू होता है बाकी समय उसे देश से कुछ लेना-देना नहीं होता।जनता को भी चाहिए कि चुनाव के समय व्यक्ति को देखे पार्टी को नहीं। पार्टी को देखते समय हम भावनाओं में भी बह सकते हैं। इसलिए दिमाग से काम लेने की  ज़रूरत है। देश की जनता को पता होना चाहिये कि राजनेता चुनाव जीतने के लिए अपने तेज़ दिमाग का ही इस्तेमाल कर जीत हासिल करने की  रणनीतियां बनाते हैं। और जनता से भावुक होकर मतदान करने की  उम्मीद करते है। जनता को भी  चाहिए कि वह वह भावनाओं में न बहकर भाषा,जाति ,धर्म ,संप्रदाय ,अमीर -गरीब की सोच से ऊपर उठकर एक जिम्मेदार ,समझदार भारतीय होने का गौरव धारण करते हुए अपने दिल की  नहीं दिमाग की  सुनते हुए  सही व्यक्ति को अपना जनप्रतिनिधि चुने। प्रमाण के तौर पर आप तीस-चालीस वर्ष पुरानी कोई भी मूवी देख लीजिये आपको महँगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी की पीड़ा सुनाई दे जायेगी।  और आज भी आम आदमी इसी से परेशान हैं।  तो क्या परिवर्तन हुआ इतने वर्षों में ? आप खुद ही सोच लीजिये।  अब भावनाओं में बहने की  नहीं दिमाग से सही फैसले का समय है। अब  मौन रहने का नहीं, सवाल करने का समय है। 

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

सहायक आचार्य :

   सहायक आचार्य बनने  का सपना 
विश्वविद्यालयों द्वारा सहायक आचार्यों की नियुक्ति हेतु जो स्क्रीनिंग का तरीका अपनाया जा रहा है। उसे  कतई  उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके मुताबिक न्यूनतम योग्यता रखने वाला योग्य  उम्मीदवार भी अयोग्य हो जाता है,अगर उसने पीएचडी /एम. फिल/अनुसन्धान कार्य/प्रकाशन कार्य  न किया हो। एसोसिएट  प्रोफ़ेसर /प्रोफ़ेसर की  नियुक्ति के लिए तो यह स्क्रीनिंग उचित एवं अनिवार्य ठहराई जा सकती है। परन्तु शिक्षण में किसी योग्य उम्मीदवार के प्रवेश करने के स्तर पर यह स्क्रीनिंग एक बाधा  से अधिक कुछ  नहीं है। यदि इसे उचित मान भी लिया जाये तो इससे  'यू जी सी नेट'  जैसी योग्यता परीक्षा की अनिवार्यता 
और महत्त्व पर ही सवालिया निशान लग जायेगा। क्योंकि इस स्क्रीनिंग में इस परीक्षा को न्यूनतम महत्त्व दिया गया है।  उदाहरण के लिए-  नेट जे आर एफ के लिए ३/५ अंक स्क्रीनिंग में दिए गए हैं ,वहीँ  एम् फिल/पीएचडी धारकों को  अधिकतम १७ अंक दिए जा रहे हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि आपके पास एम् फिल ,पीएचडी की  उपाधि है , आपने अनुसन्धान कार्य किया है , आपकी पुस्तके प्रकाशित हुई हैं तो  आपके चयन के अवसर ज्यादा हैं। मात्र स्नाकोत्तर उपाधि और नेट के आधार पर आपका सहायक आचार्य बनने का सपना मात्र दिवास्वप्न ही है। लगता है कि  ऐसा मान लिया गया है कि अनुसन्धान कार्य का अनुभव रखनेवाला, पुस्तकों का लेखक ही विश्वविद्यालय स्तर  पर शिक्षक  बनने  का असल हकदार है अन्यथा इस तरह की  स्क्रीनिंग की  बजाय एक लिखित एवं नकारात्मक अंकन के प्रावधान वाली परीक्षा के आधार  पर योग्य उम्मीदवारों  को साक्षात्कार हेतु चुना जा सकता था।  हम सभी जानते हैं कि बारहवीं  तक पढ़ाने के लिए बी एड  अनिवार्य योग्यता है।  मात्र एक  कक्षा ऊपर आते ही अनुसन्धायकों का महत्त्व अचानक बढ़ जाता है और  शिक्षण -प्रशिक्षण योग्यता का घट जाता है।   अनुसंधायक अच्छे शिक्षक हो सकते है।  पर इसका यह तात्पर्य नहीं  कि स्नातकोत्तर उपाधि रखने वाला अच्छा शिक्षक नहीं हो सकता जो उसे सबसे निचले पायदान पर डाल  दिया गया है। यह वास्तव में अवसर दिए बिना किसी को अयोग्य मान लेने जैसा है।  अगर हम दिल्ली विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में देखें तो हम पाते हैं कि यहाँ पर प्रवेश ही अधिकतम प्राप्तांक के आधार  पर होते हैं।  प्रत्येक शिक्षा बोर्ड /विश्वविद्यालय के  उच्चतम प्राप्तांक धारकों को ही प्रवेश मिल पाता  है। मतलब  भारत भर के बोर्ड/विश्वविद्यालयों के चुनिंदा विद्यार्थी ही प्रवेश पाने में सक्षम हो पाते है।  ऐसे में कई मायनों में वे सब पहले से ही मेहनती , बुद्धिमान होते हैं।  उनमें आप कितना  सुधार लायेंगे और क्या पढ़ाएंगे ? पब्लिक स्कूल से निकले ये विद्यार्थी पहले से ही साधन संपन्न होते हैं।  जिनको कि हम इंग्लिश माध्यम से पढ़ाते  हैं। जिनमें  वास्तव में सुधार की  जरुरत है  वे है हिंदी माध्यम के छात्र।   जिनको पढ़ाने  में ही अनुसंधायकों की  वास्तविक योग्यता का परीक्षण हो सकता है ,उनके लिए तो पुस्तकें तक उपलब्ध नहीं करवाई जाती। इन अभावग्रस्त लोगों को ही ज्ञान के भण्डार की असल ज़रूरत है क्योंकि 'अभाव में ही  भाव पैदा होता है।'      इस कसौटी पर ही अनुसंधायकों के ज्ञान का परीक्षण हो सकता है। बाकायदा इस पर अनुसन्धान कार्य भी होना  चाहिए  कि  "एक अनुसंधकर्ता ही प्रभावशाली सहायक आचार्य हो सकता है।" 
आज वास्तव में इस परिकल्पना के परीक्षण एवं शोध द्वारा इसकी सार्थकता  सिद्ध करने की  ज़रूरत है। अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए  लिंक पर क्लिक करें :   http://duugrg.du.ac.in/du/index.php?page=rules

रविवार, 29 सितंबर 2013

जनता की भाषा और भारत की तरक्की

  भारत के विकास कि सबसे बड़ी बाधा है. लोगों की मातृभाषा की बजाय अंग्रेजी भाषा में महत्त्वपूर्ण जानकारी का उपलब्ध होना .जब लोगों को जानकारी ही नहीं होगी .तो वो भला किससे और किस हक की बात कर पाएंगे?

उच्च शिक्षा पर अंग्रेजी काबिज है और आम इंसान अपनी मातृभाषा में 
ही उलझा हुआ है. मातृभाषा में उच्च शिक्षा उपलब्ध न होने का ही परिणाम है कि तकनीकी विषयों में रुचि रखने वाला और तकनीक के व्यावहारिक पक्ष का गहन जानकार बालक इंजीनियर बनने की बजाय 
किसी मैकेनिक की दुकान पर २००० रु महीने पर अपने भविष्य को 
उज्जवल बनाने का असफल प्रयास कर रहा होता है. 
गार्डनर के  MULTIPLE INTELLIGENCE  सिद्धांत की यहाँ पर हवा निकल 
जाती है. जब तक अंग्रेजी के जानकार भारतीय, अपने देश की जनता के हित के लिए विदेशी ज्ञान -विज्ञान को भारत की भाषाओं में उपलब्ध 
करवाने में देशभक्ति की अनुभूति नहीं करेंगे तब तक ज्ञान-विज्ञान और
भारत की तकनीकी प्रगति में आम भारतीय मात्र एक उपभोक्ता ही बना रहेगा. उत्पादन का भागीदार कभी भी नहीं बन पाएगा. आज भारतीय 
बाज़ार पर चाइना काबिज होता जा रहा है. दीवाली के सामान ,रक्षाबंधन की राखियां ,होली की पिचकारियाँ .क्या ये सब हम खुद नहीं बना सकते ?
या दुनिया के लिए बस बाज़ार ही उपलब्ध करवाते रहना हमारा काम रह गया.उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षक पूर्ण रूप से अंग्रेजी भक्त बने हुए हैं.
समझ नहीं आता कि ये सम्माननीय समूह अंग्रेजी का प्रसार कर रहा है या ज्ञान -विज्ञान का ? इन संस्थानों में मातृभाषा के विद्यार्थियों को उन्हीं 
के हाल पर छोड़ दिया जाता है. भई, ये लो अंग्रेजी में लिखे नोट्स ,बस हम इतना ही कर सकते हैं. आगे तुम्हे देखना है कि इन्हें कैसे समझोगे. क्लास में तो इंग्लिश में ही लेक्चर होंगे. हाँ,परीक्षा हिंदी में या अपनी भाषा में 
दे सकते हो. अब कितनी विकट स्थिति है ये. एक शिक्षक जो कि उस विषय का विशेषज्ञ है , अपना पल्ला झाड रहा है. जबकि उसे ज्यादा ही 
जानकारी है.बस ज़रूरत है तो देशप्रेम और इच्छाशक्ति की. जब भारतीयों को ही अपनी भाषा बोलने में झिझक महसूस होने लगे तो किसी विदेशी 
को इन सबके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है.
अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा को सीखने पढ़ने में कोई बुराई नहीं है.
महत्त्वपूर्ण यह है कि आपने अपने देश के आम लोगों तक क्या यह ज्ञान पहुँचाया ? अपनी मातृभाषा में उस सीखे हुए ज्ञान को पहुँचाने के लिए आपने क्या किया ? नीचे दिए गए लिंक पर जाएँ :

CTET : CERTIFICATE :

                                                                      CTET 

CBSE  द्वारा आयोजित CTET  परीक्षा के अंक पत्र पर परीक्षार्थी की जाति का उल्लेख नहीं होना चाहिए.इससे समाज में जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा. जाति का दंभ करने वाले लोग आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को हीन या दयादृष्टि से देखने लगेंगे. वह व्यक्ति चाहे जितना ही प्रतिभावान क्यों न हो ,जैसे ही लोगों को उसकी जाति का पता चलता है लोग फ़ौरन उसकी प्रतिभा पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं. कि "अच्छा ! कोटे से हो ? तभी यहाँ तक पहुँच गए".इस तरह के जुमले सुनकर आरक्षित वर्ग का व्यक्ति अपमानित होकर रह जाता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है .किसी अन्य योग्यता परीक्षा या अन्य किसी परीक्षा के प्रमाणपत्रों पर व्यक्ति की जाति  का उल्लेख नहीं होता है. CBSE को  भी इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिए. नियुक्ति करने वाले संस्थान पर जाति का सत्यापन छोड़ देना चाहिए.  जिससे कि  जातिवाद का अनुसरण  करने वाले लोगों को किसी की  प्रतिभा पर प्रश्न चिह्न लगाने और उसे घडी-घडी  अपमानित करने का अवसर प्राप्त न हो सके.

शनिवार, 22 जून 2013

                       CTET  की ज़रूरत ?


CTET या  TET  जैसी शिक्षक योग्यता परीक्षाओं के अच्छे परिणाम नहीं आ रहे हैं। CTET परीक्षा में उम्मीदवारों का न्यूनतम सफलता स्तर उम्मीदवारों  की
अयोग्यता को नहीं बलकी B. Ed. या शिक्षा में प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं को मान्यता देने वाली संस्था पर ही सवालिया निशान लगाता है। जब इन संस्थाओं के छात्रों ने जिस पाठ्यक्रम को पढ़ा है उसी से सम्बंधित प्रश्नपत्र 
को कर पाने में सक्षम नहीं हैं तो इनको डिग्री या डिप्लोमा  किस प्रकार की परीक्षा को पास करके मिल गया।जबकि CTET या TET के लिए जो पाठ्यक्रम निर्धारित है वह लगभग सभी शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के समकक्ष ही है। फिर किस प्रकार पाठ्यक्रम को पढ़ा होने के बावजूद भी उम्मीदवार काफी 
बड़ी संख्या में असफल हो रहे हैं। यहाँ एक बात गौर करने की है कि शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को मान्यता देने वाली और CTET और TET की निर्देशिका 
और पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाली संस्था एक ही है।
फिर इतना भारी  अंतर कैसे  आ रहा है ? ये चिंता का विषय है।
CTET या TET लागू होने बाद शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। KVS ,NVS में कई वर्षों से शिक्षकों की रिक्तियां विज्ञापित नहीं हुई हैं। KVS  ने तो 2 0 1 0 के बाद शिक्षकों की रिक्तियों का 
विज्ञापन ही नहीं दिया जो कि पहले प्रत्येक वर्ष आता ही था।
आप सोच रहे होंगे फिर उनका काम कैसे चल रहा है ?
ये कोई मुश्किल बात नहीं है। तदर्थ शिक्षकों की नियुक्ति करके ये कार्य वर्षों से चल रहा है।जिसमें नियमित शिक्षकों की अपेक्षा कम वेतन देना पड़ता है।जिससे सरकारी खजाने पर शिक्षार्थ कम बोझ पड़ता है।
इसे कहते हैं मितव्ययिता का सिद्धांत। जिसे क्रियान्वित करने में CTET की महती भूमिका की जितनी प्रशंसा की जाये वो कम है। 
होना यह चाहिए था कि  CTET की बजाय शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की समीक्षा की जाती साथ ही  जिन 
संस्थानों को इन  पाठ्यक्रमों को  संचालित करने की मान्यता मिली हुई है , उनका आधारभूत ढांचा इन पाठ्यक्रमों के लायक है भी या नहीं ? या ये संस्थान  मात्र डिग्रियाँ बाँटने का काम कर रहे हैं ? जिनमें प्रवेश परीक्षाओं के नाम पर महज खानापूर्ति हो रही हो।
इस सन्दर्भ  में इन संस्थाओं की कार्य शैली का सतत मूल्यांकन करते रहने की ज़रूरत है। हो सकता है इन शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं  में लक्ष्मी से सरस्वती का विनिमय हो रहा हो।
ऐसे में  सरस्वती पात्र के स्थान पर अपात्र के चंगुल में फँस  सकती है। उचित यही है कि धन के आधार  पर
अपात्र को पात्र  बनाने में दक्ष शिक्षण प्रशिक्षण  संस्थाओं पर नकेल कसने की ज़रूरत है। साथ ही शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में उन्हीं उम्मीदवारों के प्रवेश की व्यवस्था की जानी चाहिए जो कि वास्तव में इस पेशे को अपनाना चाहते हों। मात्र सरकारी नौकरी प्राप्त कर आराम की ज़िदगी बसर कर सकने का सुनहरा स्वप्न देखने वाले लोगों से शिक्षण व्यवसाय को बचाने की ज़रूरत है।शिक्षण को CTET या TET  की आवश्यकता नहीं है अपितु शिक्षण के लिए उपयुक्त वातारण ,पर्याप्त एवं आधुनिकतम शिक्षण सहायक सामग्री के साथ इनका बेहतर एवं रचनात्मक उपयोग कर सकने में सक्षम समर्पित व्यक्तित्व की ज़रूरत है।
जिसका चयन 2 -3 घंटों की बहुवैकल्पिक एवं  बिना नकारात्मक अंक के प्रावधान वाली परीक्षा  से नहीं हो सकता।2 -3 घंटों में सामान्यता तुक्का लगाकर क्या 
देश के भविष्य निर्माताओं की योग्यता का निर्धारण किया जा सकता है ? जी नहीं। इसके लिए  शिक्षक प्रशिक्षण 
पाठ्यक्रम को  भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर  बनाये जाने की आज आवश्यकता  है। मात्र रेसिपी की जानकारी होने से ही भोजन नहीं बनाया जा सकता बल्कि उसके लिए ज़रूरी खाद्य सामग्री भी उपलब्ध होनी चाहिए। यही हाल सरकारी स्कूलों की शिक्षा का है।
CTET या TET के माध्यम से शिक्षण  की समझ रखने 
वाले उम्मीदवारों का मान लो चयन हो भी गया तो क्या 
वे 8 0 से 1 0 0 बच्चों की कक्षा में बिना ज़रूरी सुविधाओं 
के अपनी शिक्षण  क्षमता का लाभ  बच्चों तक पहुंचा पाएंगे ? बिलकुल नहीं। तीन सेक्शन के बच्चे जब एक 
ही सेक्शन में ढूस दिए गए हो तो शिक्षण प्रक्रिया का क्या हाल होगा ,इसका अंदाज़ा सामान्य से सामान्य बुद्धि धारक भी सहज ही लगा सकता  है।

अत : CTET  से भी ज़रूरी है  सरकारी विद्यालयों के मद में अधिक धन का प्रावधान ताकि विद्यालयों में शिक्षण हेतु आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें और शिक्षक अपनी  क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने का अवसर प्राप्त कर छात्रों के भविष्य को सही दिशा दे सके । शिक्षक योग्यता परीक्षा से भी ज़रूरी है  शिक्षा में डिग्री -डिप्लोमा देने वाली संस्थाओं की परीक्षा।यदि इन संस्थाओं की ठीक प्रकार से परीक्षा हो गई  तो फिर 
CTET या TET जैसी परीक्षाओं की आवश्यकता ही नहीं 
पड़ेगी। 

शुक्रवार, 21 जून 2013

    
'आपदा  का फायदा उठाने वाले मनुष्यरूपी  जानवर' 


इंडिया टी वी पर प्रसारित खबर से पता  चला कि  उत्तराखंड की भीषण आपदा और मौत के मुंह के अरीब होने के बावजूद कुछ लोग अपने स्वार्थ और लालच से बाज़ नहीं आये।उन बेशर्म और इंसान के नाम पर कलंक 
लोगों ने केदारनाथ मंदिर का खज़ाना, वहाँ रखे दानपात्रों 
और तिजोरियों को तोड़कर लूट लिया यहाँ तक कि पास 
ही के 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 'से  लगभग तीन करोड़ रुपए भी लूट लिए।(इंडिया टी वी के अनुसार ) ऐसे बेशर्म लोग तीर्थ यात्रा करने का ढोंग करते हैं। जबकि सच तो यह है कि  मौका मिलते ही ये लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने दूसरों के माल पर अपना हाथ साफ़ करने से बाज़ नहीं आते। ये वही लोग होते हैं जिनके लिए ये आपदाएं या दंगे अपने स्वार्थ को सिद्ध करने का माध्यम मात्र होते हैं।ये लोग शवों के शरीर से गहने उतारने,उनका कीमती सामान हथियाने में भी ज़रा भी शर्म महसूस नहीं करते।ये लोग गलती से मनुष्य योनि में पैदा हो गए हैं।इनमें मनुष्यों वाली विशेषताएँ नदारद हैं।ऐसे जानवरों को पकड़कर सख्त से सख्त सजा देने की ज़रूरत है। इन्हें मनुष्यों के समाज में इन्सान का मुखौटा लगाकर घूमने की इज़ाज़त नहीं देनी चाहिए। 




मंगलवार, 18 जून 2013

      धूम्रपान : एक व्यापक सामाजिक समस्या  


प्रशासन कहता है कि सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट -बीडी पीना अपराध है।पर लोग धड़ल्ले से पीते हैं।मना  करने पर मरने -मारने पर उतारू हो जाते हैं। उनको रोकने के लिए सरकार ने कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं कर रखी है। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो धूम्रपान नहीं करते।लेकिन दूसरों के द्वारा किये जा रहे धूम्रपान का शिकार होने को मजबूर हैं। सिनेमा हॉल ,बस ,रेल,बस स्टैंड ,या भीड़ -भाड़ वाले अन्य स्थानो के अलावा अपार्टमेंट्स और फ्लैट्स भी इससे अछूते नहीं हैं। नीचे के फ्लोर से ऊपर की तरफ जाने वाला बीडी सिगरेट का धुआं ऊपर के फ्लैट्स में रहने वाले लोगों के लिए।बहुत ज्यादा नुकसानदायक है क्योंकि फ्लैट्स में तो  धुआं रोज़ ही आता है। आदमी घर छोड़ कर तो भाग नहीं जाएगा।अगर  जाकर धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को मना  करे तो वह कहेगा भाई मैं अपने घर में कुछ करूँ तुझे क्या तकलीफ हो रही है? एकबार यह धुआं घर में घुस जाए 

तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता घर में रहने वाले बच्चे ता अन्य सदस्य अनजाने ही में फेफड़ों की बीमारी से ग्रस्त हो जाएँगे और उन्हें पता भी नहीं चल पाएगा कि  उनको यह बीमारी कैसे हो गई।धूम्रपान करनेवाला अपने साथ -साथ दूसरों की भी ज़िन्दगी  को भी मौत की तरफ बढाता है।
 इस सन्दर्भ में मुझे लगता है कि व्यापक जनहित और जनस्वास्थ्य को ध्यान में  रखते हुए माननीय उच्चतम 
न्यायालय को इसके उत्पादन और बिक्री पर रोक लगा देनी चाहिए। क्योंकि यहाँ पर एक व्यक्ति की स्वतंत्रता 
अन्य व्यक्तियों के स्वस्थ  जीवन के अधिकार  में बाधक बन रही है। 

रेलवे और आम जनता

       रेलवे और आम जनता 
इंडियन रेलवे के स्टेशनों पर पीने के पानी का घोर आकाल है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी 2 0 रु की  पानी की बोतल खरीदने पर मजबूर है।ताज्जुब की बात तो यह है कि लोगों को शुद्ध जल उपलब्ध करवाने की बजाए 
खुद रेल  विभाग ' रेल नीर ' पिला कर पानी से सोना बना रहा है और बहती गंगा में हाथ धो रहा है।आप भारत के 
किसी भी रेलवे स्टेशन पर चले जाइये आपको पानी के नल से ज्यादा पानी की बोतलों के  ब्रांड देखने को मिल जाएँगे। रेल विभाग की इस मेहरबानी के कारण आम जनता की मेहनत की  कमाई पानी की भेंट चढ़ जाती  है। 2 6  और 3 2  रूपए से ज्यादा कमाने वाले को तो सरकार ने अमीर मान ही लिया है। फिर तो 2 0 रु की 
पानी की बोतल खरीदने की हिम्मत करने वाली भारत की  आम जनता तो अत्यधिक अमीर की कटैगरी में आ 
जाएगी। इस हिसाब से तो हमारा भारत वास्तव में महान और रिच है। रेल विभाग को प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर पीने के शुद्ध पानी की  व्यवस्था करनी चाहिए। फ़िल्टर वाटर      २-३  रु लीटर की  कीमत पर उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। प्रत्येक यात्री  को शुद्ध  और पर्याप्त मात्र में  जल उपलब्ध करवाना रेलवे की जिम्मेदारी है। इस हेतु किराये में ४-५ रु अधिभार के रूप में लिए जा सकते हैं जिससे कि वाटर को फ़िल्टर करने का खर्च निकल आये। एक स्टेशन पर तो हद ही हो गई। गाड़ी रुकने पर जब मैं पानी भरने के लिए उतरा तो पाया कि  किसी भी नल  पर पानी नहीं आ रहा। मजबूरी में मुझे बीस रूपये की बोतल खरीदनी पड़ी जो कि  आसानी से उपलब्ध थी। मेरे हिसाब से रेलवे के लिए आम जनता यात्री नहीं मात्र उपभोक्ता है। मिसाल के तौर पर शुद्ध पानी चाहिए तो पैसे खर्च करो , शीतल पेय चाहिए तो छपी कीमत से अधिक भुगतान करो, खाने-पीने का कोई भी सामान आपको लेना हो आपको वास्तविक मूल्य  से अधिक कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। यह आपकी मजबूरी है।आप कर भी क्या सकते हैं ? एक और बात मैं यहाँ शेयर कर रहा हूँ। 5 जून को दिल्ली से केरल जाने वाली केरला एक्सप्रेस में अपने परिवार  के साथ  स्लीपर क्लास में यात्रा कर रहा था। गर्मी बहुत अधिक थी लेकिन पानी की बोतल देने वाला कोई नहीं था। लोगों को पानी की बोतल खरीदने के लिए पेंट्री तक जाना पड़ रहा था। पेंट्री में पानी की बोतल खरीदने वालों की लाईन लगी हुई थी।
मौके का पूरा-पूरा फायदा उठाया जा रहा था।लोग अपने-अपने कोच से पानी खरीदने लिए पेंट्री में जा रहे थे। और 
पेंट्री के  लोग आराम फरमा रहे थे। शायद सोच रहे होंगे 
कि जिसको जरुरत होगी खुद आकर ले जायेगा हमें चक्कर लगाने की क्या ज़रूरत है ? दिलचस्प बात तो यह है कि बर्फ न होने का बहाना बनाकर गर्म पानी ही बेचा जा रहा था। गर्मी से बेहाल छोटे -छोटे बच्चों और बुजुर्गों की खातिर लोग गर्म पानी भी लेने को मजबूर थे।
मैंने I R C T C  पर शिकायत की लेकिन कोई फायदा 
नहीं हुआ। इसके अलावा जो खाना स्लीपर क्लास में सप्लाई किया जाता है। उसकी क्वालिटी अच्छी  नहीं होती।मात्रा  भी बहुत ही कम होती है। एक आदमी का पेट शायद ही भर पाता हो। साथ में जो पानी होना चाहिए वह भी दिया नहीं जाता बार -बार मांगना पड़ता 
है। पानी तब आता है जब खाना खाकर बोतल खरीदी जा 
चुकी होती है। 1 6 जून को पोरबंदर से दिल्ली सराय रोहिल्ला के लिए चलने वाली पोरबंदर एक्सप्रेस में मैं 
S -3 (5 -6 ) में यात्रा कर रहा था। मैंने जो खाना लिया वेज की थाली 8 5  रुपये की थी जिसमें पतले -पतले दो 
पराठे ,मटर-पनीर की सब्जी,दाल के साथ मुश्किल से   1 0 0 ग्राम पके हुए चावल छोटी -सी प्लेट में थे। दूसरे 
शब्दों में 1 0 -1 2  चम्मच मात्र चावल थे। 8 5 रु खर्च करके भी मैं भूखा ही रह गया। मुझे बाद में पचास रु का 
चावल और खरीदना पड़ा। इस तरह मेरा खाना 1 3 5  रु 
का पड़ गया। अब इतने सारे सबूत होने के बाद क्या यह 
कहना सही नहीं है कि रेलवे विभाग के लिए आम जनता 
यात्री नहीं बल्कि एक उपभोक्ता मात्र है, जिनसे पानी  की बोतलों के नाम पर ,छपी कीमत से अधिक का सामान बेचकर, घटिया और महँगा खाना बेचकर उनकी 
जेब खाली की जा रही है।एक यात्री टिकट तो लेता है। मान  लो स्लीपर में  6 0 0  रु का लेकिन इस दौरान रेलवे द्वारा उपलब्ध करवाई जा रही खाने-पीने की चीज़ों पर ही उसके 1 5 0 0 -2 0 0 0  तक खर्च हो जाते हैं। जिनमें से गर्मी के दिनों में आधे से अधिक पैसे तो पानी की बोतलें खरीदने में ही खर्च हो जाते हैं।शेष खाने में खर्च हो जाता है। लेकिन जनता को अपने पैसों के हिसाब से वस्तुएं-सेवाएँ प्राप्त नहीं होती। रेल विभाग 
को इस सन्दर्भ में भारत की गरीब जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए ट्रेन की पेंट्री में सस्ता और अच्छा 
खाना उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करनी चाहिए।
साथ ही प्रत्येक स्टेशन पर शुद्ध पेय जल की भी पर्याप्त व्यवस्था करनी चाहिए। पानी के नल पर्याप्त मात्रा  में  लगाये जाने चाहिए जिससे  कि प्रत्येक कोच के यात्रियों को ज्यादा ढूंढना न पड़े। क्योंकि गाडी बहुत थोड़े समय के लिए ही रूकती है।पानी की बंद बोतलों की बिक्री को 
ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए।क्योंकि इन बंद बोतल कंपनियों के कारण पानी की बोतलों का ढेर का ढेर रोज़ निकलता है जो पर्यावरण के लिए काफी नुकसानदायक है।जगह -जगह बोतलें ही बोतलें नज़र आती हैं। जब यह बोतलें नदी नालों में जाती है तो नदी -नाले जाम हो जाते हैं।जिससे पानी सड़ने लगता है ,जिस कारण बीमारी फैलने का खतरा बराबर बना रहता है।
आप ट्रेन की यात्रा के दौरान रेलवे ट्रैक पर बोतलों के ढेर 
आसानी से देख सकते हैं। जिसे हम मात्र पानी समझकर 
2 0 रु में खरीद लेते हैं। यह  कंपनियाँ पानी से ही करोड़ों 
कमा रही हैं। अब आप सोच ही सकते हैं कि यदि रेल विभाग पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था ईमान दारी और सेवाभाव से स्टेशनों पर कर दे तो देश की आम जनता की मेहनत की करोड़ों की कमाई आसानी से बच सकती 
है। जिसे जनता दूसरे ज़रूरी कामों में खर्च कर महंगाई के समय  में थोड़ी राहत  ज़रूर पा  सकती है। 



   

   
        


शुक्रवार, 17 मई 2013

UNIVERSITY MEIN LECTURERSHIP

                                                       भावी शिक्षक और उच्च शिक्षा           

  विश्वविद्यालय में  एक अदद प्रवक्ता बनने  की चाह में न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं .एक सामान्य 

प्रतिभा का पुलिंदा धारी  प्राणी यह गलत फहमी पाल लेता है कि  उसकी दिन रात की मेहनत  रंग लाएगी और वह जरुर भारत के भविष्य निर्माण में हाथ बंटा पाएगा . लेकिन  जब उसका सामना  वास्तविकता से  होता है, तो उसकी  अक्ल पर पड़ा अक्लमंदी का दम्भी पर्दा स्वत: ही  हट जाता है और उसे अपने ज्ञानी होने की अज्ञानता का बोध हो जाता है . उसे परमहिमाप्रसारण के सन्दर्भ में अपनी योग्यता का अहसास जल्द ही हो जाता है। बेचारा लग जाता है दिन रात एक कर सर्वोच्चमहिमाधारी खेवनहार  की तलाश में .वो बेचारा एक ढूँढ़ता है ,उसे ऐसे महिमाधारी  हजारों की संख्या में मिल जाते हैं .जो लगातार ऐसे लोगों की तलाश में लगे  हैं जो   उनकी महिमा का बोझ वहन  कर  महिमा का अविरल प्रसार कर सके .इस परंपरा के प्रसार से उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रतिभाशाली सृजनात्मक शिक्षकों का पहुँच पाना एक सपना ही रह जाता है।शिक्षा राजनीतिक गुटबाजी का शिकार सी हो जाती है। शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता के स्थान पर जब व्यक्तिनिष्ठता हावी होने लग जाती है  उसी क्षण शिक्षा का पतन होना शुरू हो जाता है। एक सही शिक्षक के चयन में वस्तुनिष्ठता का होना शिक्षण की प्रभावशीलता की दृष्टि से बेहद जरुरी है। जब चयन समिति के नज़रिए में व्यक्तिनिष्ठता अपने चरम पर पहुँच जाती है तब प्रतिभा का नहीं व्यक्ति का चयन हो जाता है। 
यहाँ पर चयन- दृष्टि प्रतिभा केन्द्रित नहीं बल्कि व्यक्ति केन्द्रित हो जाती है। 

 अब बात करते हैं समाधान की।   अगर यह समस्या है तो फिर इसका समाधान क्या है ?  बेहद आसान समाधान  है इस समस्या का : राज्यों में राज्यस्तरीय संस्था SLET  के अलावा  एवं  राष्ट्रीय स्तर पर   UGC,  NET  के अलावा एक अतिरिक्त प्रतियोगिता परीक्षा  का आयोजन कर सकती हैं जिसमें संभावित तदर्थ /स्थायी रिक्तियों हेतु उम्मीदवारों को  सर्वोच्च प्राप्तांकों  की मेरिट के आधार पर  मात्र  एक शैक्षणिक वर्ष के लिए सूचीबद्ध किया  जा सकता है। रिक्तियां होने पर सूचीबद्ध  उम्मीदवारों में से ही मेरिट के आधार पर नियुक्ति दी  जा सकती है ।  यह सूची प्रत्येक विश्वविद्यालय के तदर्थ पैनल के स्थान पर लायी जा सकती है। मेरिट सूची को मात्र एक  शैक्षणिक वर्ष के लिए ही मान्य बनाया जा सकता है। यह परीक्षा  प्रत्येक वर्ष आयोजित की जा सकती है. इससे फायदा यह होगा कि चयन प्रक्रिया से व्यक्तिनिष्ठता समाप्त हो जाएगी।प्रतिभाशाली उम्मीदवार ही शिक्षक बन सकेगा। चाटुकारिता की परंपरा पर विराम लग सकेगा। चयन समिति का नियुक्ति प्रक्रिया से अधिकार समाप्त होने से पद के उपयुक्त व्यक्ति ही चुना जा सकेगा। जिसकी विषय पर अच्छी पकड़ है। यहाँ एक बात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है , जो परीक्षा आयोजित की जाए, वह वस्तुनिष्ठ अर्थात  बहुवैकल्पिक हो। उसके प्रश्नों में गहराई हो , शिक्षा मनोविज्ञान , शिक्षण विधियों ,शिक्षा दर्शन, शिक्षा का इतिहास से सम्बंधित  प्रश्न भी मुख्य विषय के साथ होने चाहिए ताकि भावी शिक्षकों की विषय विशेषज्ञता के साथ -साथ उनकी की शिक्षण अभिक्षमता  की भी परख की जा सके। आज के समय में  प्रत्येक शिक्षक के लिए मात्र विषय का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है। ज्ञान तो  इन्टरनेट पर भरा पड़ा है, बल्कि एक शिक्षक के लिए शिक्षण की विविध प्रविधियों की भी जानकारी होना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि विद्वान होना अलग बात है , और शिक्षक  होना  अलग बात। ज्ञानी हम बेहद हो सकते हैं। यदि सामान्य छात्र तक हम सहज बोधगम्य तरीके से अपनी बात  नहीं पहुँचा सकते तो हमारे ज्ञानी हों  का क्या अर्थ है  ? आज बाज़ार तरह -तरह की गाइड्स से भरे पड़े हैं। इसी से हमारी शिक्षण योग्यता पर सवालिया निशान लग जाता है। बच्चों को हम विषय समझा  नहीं पा रहे और छात्र गाइड्स में अपना सुनहरा भविष्य तलाश रहें हैं। यह सब नियुक्ति प्रक्रिया में व्यक्तिनिष्ठता का ही परिणाम है।  अंत में यही कहा जा सकता है कि मेरिट सूची निर्माण के लिए होने वाली परीक्षा में नकारात्मक अंकों का 
प्रावधान जरुर होना चाहिए जिससे कि तुक्का लगाने वाले के स्थान पर विषय की गहरी समझ रखने वाला उम्मीदवार  ही मेरिट सूची में आ सके। जब तक ऐसा नहीं होगा उच्च शिक्षा में प्रतिभाओं का पदार्पण सदैव अवरुद्ध रहेगा। 

सोमवार, 14 नवंबर 2011

6 MAHINON KI SAWDHANI ,5 VARSHON KI AASANI

     बेबस जनता                                                                                                                                                                                                                  'अंतिम ६ महीनों की सावधानी और अगले पाँच वर्षों तक आसानी'. पढ़कर अजीब लग रहा होगा न ? बात ही बड़ी अजीब है.हम सभी देखते आए हैं कि सत्ता में जो भी दल काबिज़ हो जाता है ,साढ़े चार साल तक तो उसे जनता से  मानों  कुछ लेना-देना ही नहीं होता.जब सरकार के अंतिम ५-६ महीने रह जाते हैं तब सत्ताधारी दल  अपनी उपलब्धियों का पुलिंदा और गोल-मटोल बातों का पिटारा लेकर निकल पड़ते हैं भोली-भाली जनता कोमनाने.
और जनता भी मानों गाय हो जाती है. पिछले चार-साढ़े चार वर्षों को भूलकर अंतिम ५-६ महीनों में किये गए वादों के  झाँसे में आ जाती है . और चुन लेती है उनको जिन पर उसे कभी बहुत गुस्सा आता था.मीठी -मीठी बातों में आकर जनता पिछले सभी ग़म भूलकर दुबारा अपना कीमती वोट किसी को भी बिना सोचे-समझे दे देती है और जब दल दुबारा सत्ता में काबिज़ हो जाता है तब  अपने  आपको ४-५ सालों तक के लिए निश्चिन्त मानकर जनहित और जनवाणी को नज़रंदाज़ कर बैठता है . और जनता बेबस .लाचार होकर खुदको ठगा हुआ महसूस करती है पर तब कुछ नहीं हो सकता .उसे अगले चुनाव तक अपने दर्द को पीना पड़ता है. ताज्जुब की बात तो यह है कि जब चुनाव का वक़्त आ जाता है तब जनता दुबारा झाँसे में आकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने  को तैयार रहती है.
लच्छेदार,चतुराई भरी बातों के शब्दजाल  में  आसानी से फँस जाने ही में उसे बड़ा मज़ा आता है. बाद में फिर वही पछतावे का रोना-पीटना शुरू.कि भईया गलती हो गई गलत आदमी को चुन लिया. जो  अनजाने में गड्ढे में गिरे उसे तो नादान कहा जा सकता है.लेकिन जो खड्डा देखने के बाद भी खड्डे में गिर जाये उसे मैं क्या कहूँ ? वे स्वयं अपने लिए उचित विशेषण चुनने के लिए लोकतंत्र में स्वतंत्र हैं. अब जनता को सोचना है भाई, कि उसे भाषण चाहिए या एक्शन ? क्योंकि उत्तर-प्रदेश के सन्दर्भ में यह सब शुरू हो चुका है. चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले किसी खास दल के नेता और उसकी उपलब्धियों को बार-बार और ज्यादातर दिखाने वाली ख़बरों से भी आम जनता को सतर्क रहने की जरुरत है. क्योंकि कई बार देखने में आया है कि यह सब पेड न्यूज़ का हिस्सा है. यानी पैसा देकर ख़बरों का प्रसारण करवाना .इस तरह की बातों से आम जनता वाकिफ नहीं होती और जल्द ही झाँसे आ जाती है. जनता को ऐसी ख़बरों पर पैनी नज़र रखनी चाहिए.यहाँ दिल से नहीं दिमाग से काम लेने की ज़रूरत होती है.

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

ANSHAN ABHI BAKI HAI

 मातृभाषा   और  देश का विकास                                                                                                                        अन्ना के आन्दोलन ने देश की जनता को जगा दिया है.  राजनीतिक दलों को जनता की असल ताकत का अहसास भी शायद अब हो गया होगा.भारत में इस तरह की जागरूकता के लिए जरुरी  है आम जनता की सक्रिय राजनीतिक भागीदारी और उनका राजनीतिक शिक्षण .इसके लिए जरुरी है कि कानूनी जानकारियाँ आम जनता को अपनी मातृभाषा में आसानी से उपलब्ध हों. संसद में क्या हो रहा , न्यायालयों में क्या हो रहा है ? इन महत्त्वपूर्ण बातों की सम्पूर्ण जानकारी आम जनता को नहीं हो पाती. विभिन्न प्रकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी और उनका लाभ उठाने की प्रक्रिया तक आम आदमी को नहीं पता .क्योंकि इन बातों की विस्तृत जानकारी आम आदमी को अपनी मातृभाषा में नहीं मिल पाती.आम आदमी के सुविधा के लिए असंख्य  NGO देश भर में फैले हुए हैं. पर क्या आम आदमी को पता है कि NGO किस चिड़िया का नाम है . जागरूकता  लाने लिए के सबसे जरुरी है कि हमारी आवाज़ हर आम और ख़ास तक पहुँचे .और ऐसा करने में कोई विदेशी भाषा  हमारी थोड़ी सहायता ज़रूर कर सकती है पर हमारे मकसद को पूरा नहीं कर सकती. जिस दिन सभी महत्त्वपूर्ण  जानकारियाँ आम जनता को अपनी मातृभाषा में मिलने लगेंगी  उस दिन से हमारा देश तरक्की की सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाएगा. किसी भी भ्रष्टाचारी का बच निकलना लगभग असंभव हो जाएगा. जब जानकारी होगी तब आम जनता नियमों का हवाला देकर हर भ्रष्टाचारी से हिसाब माँग सकेगी,न्यायालय और संसद में किस कानून के अंतर्गत क्या फैसला हो रहा है और क्यों हो रहा है , यह  समझ पायेगी. संसद में पेश किये जाने वाले विधेयकों के मसौदों  और उसके  कानून बनने की प्रक्रिया के लिए निर्धारित नियमों के बारे में जानकारी   होने पर आम जनता लोकपाल बिल और जनलोकपाल बिल जैसे फर्क  जान पाएगी. जो कि भारत देश के सुनहरे भविष्य के लिए बहुत ही बेहतर होगा.अभी होता यही है कि आम जनता को महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध  ही नहीं होती . यदि होती भी हैं तो बहुत थोड़ी या कामचलाऊ ही होती हैं. अधिक जानकारी के लिए उसे अंग्रेजी की शरण में जाने की सलाह दी जाती है. अब यह  तो हम सभी जानते ही हैं कि हमारे देश के करोंड़ों  लोगों को अपनी मातृभाषा तक में लिखना-पढ़ना नहीं आता. अंग्रेज़ी की जानकारी तो दूर की बात  है.बिना अपनी मातृभाषा को महत्त्व दिए हम कानूनी  दांवपेच को समझ नहीं पाएँगे. देश को भ्रष्टाचारियों के हाथों बस बेबस लूटता देखते रहेंगे. इसके अभाव में हम भ्रष्टाचार को कुछ समय के लिए रोक जरुर सकते हैं पर समाप्त नहीं कर सकते. होना यह चाहिए कि राष्ट्रीय सन्दर्भ में मातृभाषा और अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में अंग्रेज़ी या अन्य विदेशी भाषा का प्रयोग किया जा सकता है.राष्ट्रीय सन्दर्भ में भी  ज़रूरत के अनुसार अंग्रेज़ी का इस्तेमाल किया जा सकता है  पर सेवक के रूप में मालिक के रूप में नहीं. हम सभी  जानते हैं कि अंग्रेज़ी की संवैधानिक स्थिति एक सेविका की है स्वामिनी की नहीं . पर आज यह स्वामी बन बैठी है. यही स्थिति सभी समस्याओं की जड़  है. हिंदी के कवि भारतेंदु  ने बहुत पहले ही इस स्थिति को समझ लिया था. इसलिए उनका कहना था -- 
"निज भाषा उन्नति आहे  सब उन्नति को मूल." अर्थात  अपनी भाषा की तरक्की होने पर ही सब तरह की तरक्की संभव हो पाती है.

शनिवार, 23 जुलाई 2011

SHIKSHA KA ADHIKAR

हमारे देश में सरकारी विद्यालयों की हालत किसी से छिपी नहीं है. प्रत्येक SECTION में ७०-८० बच्चे होना आम बात है .ऐसे में किस प्रकार एक शिक्षक प्रत्येक बच्चे पर सही तरीके से ध्यान दे पायेगा , इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है.आमतौर पर प्रत्येक शिक्षक को 5 SECTION मिलते हैं .अब यदि एक SECTION में ७०-८० बच्चे हों तो प्रत्येक शिक्षक के पास ३५०-४०० बच्चे होंगे .उन बच्चों का रिकॉर्ड रखना,उनकी अभ्यास पुस्तिकाएँ जाँचना आदि कार्य उसे करने होते हैं.इसके आलावा छात्रों के समुचित विकास के लिए पाठ सहगामी क्रियाएँ भी आवश्यक होती हैं .इतना सारा काम और प्रत्येक बच्चे का समुचित आंकलन कर पाना लगभग असंभव है .फिर भी   सरकार को शिक्षकों की भर्ती और छात्र -शिक्षक के आदर्श अनुपात को सुनिश्चित करने में  कोई चिंता  नहीं लगती.जो कि RTE के लिए गंभीर स्थिति है. शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में ही बरसों लग जाते हैं . अब TET के बाद  शिक्षकों की और भी किल्लत हो सकती है .एक तरफ सरकार का तर्क है कि नौकरी है पर शिक्षक नहीं मिलते दूसरी तरफ TET के बाद तो शिक्षकों कि संख्या और भी सीमित हो जाएगी.क्या  सारी जिम्मेदारी शिक्षकों की ही है कि वो लगातार अपनी योग्यताओं को प्रमाणित करते रहें .वास्तविकता तो ये है कि जब तक नियुक्ति परीक्षाओं में नकारात्मक अंकन नहीं होगा तब  तक शिक्षा के क्षेत्र  में मात्र तुक्का  लगाने  वाले और स्पीड टेस्ट में माहिर लोग ही जमे रहेंगे. CTET  के माध्यम से शिक्षकों को योग्य मानने वाले क्या ज़रा बताएँगे कि मात्र ९० मिनट  में किस प्रकार सही तरीके से  १५० सवाल हल किये जा सकते हैं ? मतलब प्रत्येक सवाल के लिए मात्र 36 सेकंड का वक्त  .और प्रश्न भी ऐसे कि जिनमें बड़े-बड़े पैराग्राफ भी शामिल हैं . अब ऐसे में क्या कोई अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए बुध्दि लगाएगा  या तुक्का ?यदि बुध्धि लगाये तो  प्रश्न छूटें और अगर तुक्का लगाये तो उसकी  योग्यता  ही संदेह  के घेरे में आ  जाये  .शिक्षकों की योग्यता को सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि प्रश्नपत्रों में नकारात्मक अंकन किया जाये .यदि नकारात्मक अंकन होगा तो वही व्यक्ति चुना जायेगा जिसको विषय का पूर्ण ज्ञान होगा  न कि तुक्का लगाने वाला .साथ ही ज़रूरी नहीं कि जो व्यक्ति अच्छा  लिख सकता है बड़े-बड़े उत्तर दे सकता है वह अच्छा शिक्षक भी हो  .यह  तो स्पीड टेस्ट है निर्धारित  समय में जिसने लिख दिया वो योग्य हो गया और  जो नहीं लिख पाया वो अयोग्य.अब दूसरा पहलू भी देखते हैं कई बार किसी के पास दुनिया भर का ज्ञान होता है और वह एक कुशल वक्ता भी होता है.परन्तु स्पीड टेस्ट में वह निर्धारित समय में लिख नहीं पाता और उसकी सारी काबिलियत पर प्रश्नचिह्न लग जाता है.CCE में तो बच्चों के लिए प्रावधान कर दिया गया कि वह FORMATIVE
ASSESSMENT ( रचनात्मक आंकलन) जिसमें कि लिखने  का कम और बोलने का एवं करने का कार्य अधिक  है में अच्छे  अंक प्राप्त कर अपनी योग्यता प्रमाणित कर सकता है. शिक्षकों कि नियुक्ति के सन्दर्भ में भी यही व्यवस्था लागू  की जा सकती है जिसमें विषय से सम्बंधित बहुवैकल्पिक प्रश्न दिए जा सकते हैं .साथ ही इसमें नकारात्मक अंकन अवश्य हो जिससे उपर्युक्त योग्यता रखने वाले व्यक्ति एवं विषय ज्ञान रखने वाले योग्य व्यक्ति ही चुने  जा सकेंगे. जो कि शिक्षा और शिक्षार्थियों  के लिए बेहतर स्थिति हो सकती है. उदाहरण के लिए पब्लिक SCHOOLS में  मात्र साधारण परीक्षा एवं साक्षात्कार  के आधार पर योग्य शिक्षक नियुक्त किये जाते हैं . और उनकी शिक्षा  की गुणवत्ता किसी से छुपी नहीं है. वहाँ सबसे अधिक ध्यान व्यक्ति के व्यावहारिक ज्ञान पर दिया जाता है, सिद्धांतों पर नहीं. ज़रूरत इच्छाशक्ति की है और सही रूप से प्रावधानों को लागू  करने की. AAJ शिक्षा को सिद्धांतों  की नहीं व्यवहार  की ज़रूरत है. जब तक लोग अपने निजी स्वार्थ को  त्याग कर देश के  लिए  नहीं सोचेंगे ,देश से प्रेम नहीं करेंगे तब तक योजनाओं के अपेक्षित परिणाम शायद ही मिल सकेंगे.