शुक्रवार, 17 मई 2013

UNIVERSITY MEIN LECTURERSHIP

                                                       भावी शिक्षक और उच्च शिक्षा           

  विश्वविद्यालय में  एक अदद प्रवक्ता बनने  की चाह में न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं .एक सामान्य 

प्रतिभा का पुलिंदा धारी  प्राणी यह गलत फहमी पाल लेता है कि  उसकी दिन रात की मेहनत  रंग लाएगी और वह जरुर भारत के भविष्य निर्माण में हाथ बंटा पाएगा . लेकिन  जब उसका सामना  वास्तविकता से  होता है, तो उसकी  अक्ल पर पड़ा अक्लमंदी का दम्भी पर्दा स्वत: ही  हट जाता है और उसे अपने ज्ञानी होने की अज्ञानता का बोध हो जाता है . उसे परमहिमाप्रसारण के सन्दर्भ में अपनी योग्यता का अहसास जल्द ही हो जाता है। बेचारा लग जाता है दिन रात एक कर सर्वोच्चमहिमाधारी खेवनहार  की तलाश में .वो बेचारा एक ढूँढ़ता है ,उसे ऐसे महिमाधारी  हजारों की संख्या में मिल जाते हैं .जो लगातार ऐसे लोगों की तलाश में लगे  हैं जो   उनकी महिमा का बोझ वहन  कर  महिमा का अविरल प्रसार कर सके .इस परंपरा के प्रसार से उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रतिभाशाली सृजनात्मक शिक्षकों का पहुँच पाना एक सपना ही रह जाता है।शिक्षा राजनीतिक गुटबाजी का शिकार सी हो जाती है। शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता के स्थान पर जब व्यक्तिनिष्ठता हावी होने लग जाती है  उसी क्षण शिक्षा का पतन होना शुरू हो जाता है। एक सही शिक्षक के चयन में वस्तुनिष्ठता का होना शिक्षण की प्रभावशीलता की दृष्टि से बेहद जरुरी है। जब चयन समिति के नज़रिए में व्यक्तिनिष्ठता अपने चरम पर पहुँच जाती है तब प्रतिभा का नहीं व्यक्ति का चयन हो जाता है। 
यहाँ पर चयन- दृष्टि प्रतिभा केन्द्रित नहीं बल्कि व्यक्ति केन्द्रित हो जाती है। 

 अब बात करते हैं समाधान की।   अगर यह समस्या है तो फिर इसका समाधान क्या है ?  बेहद आसान समाधान  है इस समस्या का : राज्यों में राज्यस्तरीय संस्था SLET  के अलावा  एवं  राष्ट्रीय स्तर पर   UGC,  NET  के अलावा एक अतिरिक्त प्रतियोगिता परीक्षा  का आयोजन कर सकती हैं जिसमें संभावित तदर्थ /स्थायी रिक्तियों हेतु उम्मीदवारों को  सर्वोच्च प्राप्तांकों  की मेरिट के आधार पर  मात्र  एक शैक्षणिक वर्ष के लिए सूचीबद्ध किया  जा सकता है। रिक्तियां होने पर सूचीबद्ध  उम्मीदवारों में से ही मेरिट के आधार पर नियुक्ति दी  जा सकती है ।  यह सूची प्रत्येक विश्वविद्यालय के तदर्थ पैनल के स्थान पर लायी जा सकती है। मेरिट सूची को मात्र एक  शैक्षणिक वर्ष के लिए ही मान्य बनाया जा सकता है। यह परीक्षा  प्रत्येक वर्ष आयोजित की जा सकती है. इससे फायदा यह होगा कि चयन प्रक्रिया से व्यक्तिनिष्ठता समाप्त हो जाएगी।प्रतिभाशाली उम्मीदवार ही शिक्षक बन सकेगा। चाटुकारिता की परंपरा पर विराम लग सकेगा। चयन समिति का नियुक्ति प्रक्रिया से अधिकार समाप्त होने से पद के उपयुक्त व्यक्ति ही चुना जा सकेगा। जिसकी विषय पर अच्छी पकड़ है। यहाँ एक बात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है , जो परीक्षा आयोजित की जाए, वह वस्तुनिष्ठ अर्थात  बहुवैकल्पिक हो। उसके प्रश्नों में गहराई हो , शिक्षा मनोविज्ञान , शिक्षण विधियों ,शिक्षा दर्शन, शिक्षा का इतिहास से सम्बंधित  प्रश्न भी मुख्य विषय के साथ होने चाहिए ताकि भावी शिक्षकों की विषय विशेषज्ञता के साथ -साथ उनकी की शिक्षण अभिक्षमता  की भी परख की जा सके। आज के समय में  प्रत्येक शिक्षक के लिए मात्र विषय का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है। ज्ञान तो  इन्टरनेट पर भरा पड़ा है, बल्कि एक शिक्षक के लिए शिक्षण की विविध प्रविधियों की भी जानकारी होना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि विद्वान होना अलग बात है , और शिक्षक  होना  अलग बात। ज्ञानी हम बेहद हो सकते हैं। यदि सामान्य छात्र तक हम सहज बोधगम्य तरीके से अपनी बात  नहीं पहुँचा सकते तो हमारे ज्ञानी हों  का क्या अर्थ है  ? आज बाज़ार तरह -तरह की गाइड्स से भरे पड़े हैं। इसी से हमारी शिक्षण योग्यता पर सवालिया निशान लग जाता है। बच्चों को हम विषय समझा  नहीं पा रहे और छात्र गाइड्स में अपना सुनहरा भविष्य तलाश रहें हैं। यह सब नियुक्ति प्रक्रिया में व्यक्तिनिष्ठता का ही परिणाम है।  अंत में यही कहा जा सकता है कि मेरिट सूची निर्माण के लिए होने वाली परीक्षा में नकारात्मक अंकों का 
प्रावधान जरुर होना चाहिए जिससे कि तुक्का लगाने वाले के स्थान पर विषय की गहरी समझ रखने वाला उम्मीदवार  ही मेरिट सूची में आ सके। जब तक ऐसा नहीं होगा उच्च शिक्षा में प्रतिभाओं का पदार्पण सदैव अवरुद्ध रहेगा। 

सोमवार, 14 नवंबर 2011

6 MAHINON KI SAWDHANI ,5 VARSHON KI AASANI

     बेबस जनता                                                                                                                                                                                                                  'अंतिम ६ महीनों की सावधानी और अगले पाँच वर्षों तक आसानी'. पढ़कर अजीब लग रहा होगा न ? बात ही बड़ी अजीब है.हम सभी देखते आए हैं कि सत्ता में जो भी दल काबिज़ हो जाता है ,साढ़े चार साल तक तो उसे जनता से  मानों  कुछ लेना-देना ही नहीं होता.जब सरकार के अंतिम ५-६ महीने रह जाते हैं तब सत्ताधारी दल  अपनी उपलब्धियों का पुलिंदा और गोल-मटोल बातों का पिटारा लेकर निकल पड़ते हैं भोली-भाली जनता कोमनाने.
और जनता भी मानों गाय हो जाती है. पिछले चार-साढ़े चार वर्षों को भूलकर अंतिम ५-६ महीनों में किये गए वादों के  झाँसे में आ जाती है . और चुन लेती है उनको जिन पर उसे कभी बहुत गुस्सा आता था.मीठी -मीठी बातों में आकर जनता पिछले सभी ग़म भूलकर दुबारा अपना कीमती वोट किसी को भी बिना सोचे-समझे दे देती है और जब दल दुबारा सत्ता में काबिज़ हो जाता है तब  अपने  आपको ४-५ सालों तक के लिए निश्चिन्त मानकर जनहित और जनवाणी को नज़रंदाज़ कर बैठता है . और जनता बेबस .लाचार होकर खुदको ठगा हुआ महसूस करती है पर तब कुछ नहीं हो सकता .उसे अगले चुनाव तक अपने दर्द को पीना पड़ता है. ताज्जुब की बात तो यह है कि जब चुनाव का वक़्त आ जाता है तब जनता दुबारा झाँसे में आकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने  को तैयार रहती है.
लच्छेदार,चतुराई भरी बातों के शब्दजाल  में  आसानी से फँस जाने ही में उसे बड़ा मज़ा आता है. बाद में फिर वही पछतावे का रोना-पीटना शुरू.कि भईया गलती हो गई गलत आदमी को चुन लिया. जो  अनजाने में गड्ढे में गिरे उसे तो नादान कहा जा सकता है.लेकिन जो खड्डा देखने के बाद भी खड्डे में गिर जाये उसे मैं क्या कहूँ ? वे स्वयं अपने लिए उचित विशेषण चुनने के लिए लोकतंत्र में स्वतंत्र हैं. अब जनता को सोचना है भाई, कि उसे भाषण चाहिए या एक्शन ? क्योंकि उत्तर-प्रदेश के सन्दर्भ में यह सब शुरू हो चुका है. चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले किसी खास दल के नेता और उसकी उपलब्धियों को बार-बार और ज्यादातर दिखाने वाली ख़बरों से भी आम जनता को सतर्क रहने की जरुरत है. क्योंकि कई बार देखने में आया है कि यह सब पेड न्यूज़ का हिस्सा है. यानी पैसा देकर ख़बरों का प्रसारण करवाना .इस तरह की बातों से आम जनता वाकिफ नहीं होती और जल्द ही झाँसे आ जाती है. जनता को ऐसी ख़बरों पर पैनी नज़र रखनी चाहिए.यहाँ दिल से नहीं दिमाग से काम लेने की ज़रूरत होती है.

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

ANSHAN ABHI BAKI HAI

 मातृभाषा   और  देश का विकास                                                                                                                        अन्ना के आन्दोलन ने देश की जनता को जगा दिया है.  राजनीतिक दलों को जनता की असल ताकत का अहसास भी शायद अब हो गया होगा.भारत में इस तरह की जागरूकता के लिए जरुरी  है आम जनता की सक्रिय राजनीतिक भागीदारी और उनका राजनीतिक शिक्षण .इसके लिए जरुरी है कि कानूनी जानकारियाँ आम जनता को अपनी मातृभाषा में आसानी से उपलब्ध हों. संसद में क्या हो रहा , न्यायालयों में क्या हो रहा है ? इन महत्त्वपूर्ण बातों की सम्पूर्ण जानकारी आम जनता को नहीं हो पाती. विभिन्न प्रकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी और उनका लाभ उठाने की प्रक्रिया तक आम आदमी को नहीं पता .क्योंकि इन बातों की विस्तृत जानकारी आम आदमी को अपनी मातृभाषा में नहीं मिल पाती.आम आदमी के सुविधा के लिए असंख्य  NGO देश भर में फैले हुए हैं. पर क्या आम आदमी को पता है कि NGO किस चिड़िया का नाम है . जागरूकता  लाने लिए के सबसे जरुरी है कि हमारी आवाज़ हर आम और ख़ास तक पहुँचे .और ऐसा करने में कोई विदेशी भाषा  हमारी थोड़ी सहायता ज़रूर कर सकती है पर हमारे मकसद को पूरा नहीं कर सकती. जिस दिन सभी महत्त्वपूर्ण  जानकारियाँ आम जनता को अपनी मातृभाषा में मिलने लगेंगी  उस दिन से हमारा देश तरक्की की सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाएगा. किसी भी भ्रष्टाचारी का बच निकलना लगभग असंभव हो जाएगा. जब जानकारी होगी तब आम जनता नियमों का हवाला देकर हर भ्रष्टाचारी से हिसाब माँग सकेगी,न्यायालय और संसद में किस कानून के अंतर्गत क्या फैसला हो रहा है और क्यों हो रहा है , यह  समझ पायेगी. संसद में पेश किये जाने वाले विधेयकों के मसौदों  और उसके  कानून बनने की प्रक्रिया के लिए निर्धारित नियमों के बारे में जानकारी   होने पर आम जनता लोकपाल बिल और जनलोकपाल बिल जैसे फर्क  जान पाएगी. जो कि भारत देश के सुनहरे भविष्य के लिए बहुत ही बेहतर होगा.अभी होता यही है कि आम जनता को महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध  ही नहीं होती . यदि होती भी हैं तो बहुत थोड़ी या कामचलाऊ ही होती हैं. अधिक जानकारी के लिए उसे अंग्रेजी की शरण में जाने की सलाह दी जाती है. अब यह  तो हम सभी जानते ही हैं कि हमारे देश के करोंड़ों  लोगों को अपनी मातृभाषा तक में लिखना-पढ़ना नहीं आता. अंग्रेज़ी की जानकारी तो दूर की बात  है.बिना अपनी मातृभाषा को महत्त्व दिए हम कानूनी  दांवपेच को समझ नहीं पाएँगे. देश को भ्रष्टाचारियों के हाथों बस बेबस लूटता देखते रहेंगे. इसके अभाव में हम भ्रष्टाचार को कुछ समय के लिए रोक जरुर सकते हैं पर समाप्त नहीं कर सकते. होना यह चाहिए कि राष्ट्रीय सन्दर्भ में मातृभाषा और अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में अंग्रेज़ी या अन्य विदेशी भाषा का प्रयोग किया जा सकता है.राष्ट्रीय सन्दर्भ में भी  ज़रूरत के अनुसार अंग्रेज़ी का इस्तेमाल किया जा सकता है  पर सेवक के रूप में मालिक के रूप में नहीं. हम सभी  जानते हैं कि अंग्रेज़ी की संवैधानिक स्थिति एक सेविका की है स्वामिनी की नहीं . पर आज यह स्वामी बन बैठी है. यही स्थिति सभी समस्याओं की जड़  है. हिंदी के कवि भारतेंदु  ने बहुत पहले ही इस स्थिति को समझ लिया था. इसलिए उनका कहना था -- 
"निज भाषा उन्नति आहे  सब उन्नति को मूल." अर्थात  अपनी भाषा की तरक्की होने पर ही सब तरह की तरक्की संभव हो पाती है.

शनिवार, 23 जुलाई 2011

SHIKSHA KA ADHIKAR

हमारे देश में सरकारी विद्यालयों की हालत किसी से छिपी नहीं है. प्रत्येक SECTION में ७०-८० बच्चे होना आम बात है .ऐसे में किस प्रकार एक शिक्षक प्रत्येक बच्चे पर सही तरीके से ध्यान दे पायेगा , इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है.आमतौर पर प्रत्येक शिक्षक को 5 SECTION मिलते हैं .अब यदि एक SECTION में ७०-८० बच्चे हों तो प्रत्येक शिक्षक के पास ३५०-४०० बच्चे होंगे .उन बच्चों का रिकॉर्ड रखना,उनकी अभ्यास पुस्तिकाएँ जाँचना आदि कार्य उसे करने होते हैं.इसके आलावा छात्रों के समुचित विकास के लिए पाठ सहगामी क्रियाएँ भी आवश्यक होती हैं .इतना सारा काम और प्रत्येक बच्चे का समुचित आंकलन कर पाना लगभग असंभव है .फिर भी   सरकार को शिक्षकों की भर्ती और छात्र -शिक्षक के आदर्श अनुपात को सुनिश्चित करने में  कोई चिंता  नहीं लगती.जो कि RTE के लिए गंभीर स्थिति है. शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में ही बरसों लग जाते हैं . अब TET के बाद  शिक्षकों की और भी किल्लत हो सकती है .एक तरफ सरकार का तर्क है कि नौकरी है पर शिक्षक नहीं मिलते दूसरी तरफ TET के बाद तो शिक्षकों कि संख्या और भी सीमित हो जाएगी.क्या  सारी जिम्मेदारी शिक्षकों की ही है कि वो लगातार अपनी योग्यताओं को प्रमाणित करते रहें .वास्तविकता तो ये है कि जब तक नियुक्ति परीक्षाओं में नकारात्मक अंकन नहीं होगा तब  तक शिक्षा के क्षेत्र  में मात्र तुक्का  लगाने  वाले और स्पीड टेस्ट में माहिर लोग ही जमे रहेंगे. CTET  के माध्यम से शिक्षकों को योग्य मानने वाले क्या ज़रा बताएँगे कि मात्र ९० मिनट  में किस प्रकार सही तरीके से  १५० सवाल हल किये जा सकते हैं ? मतलब प्रत्येक सवाल के लिए मात्र 36 सेकंड का वक्त  .और प्रश्न भी ऐसे कि जिनमें बड़े-बड़े पैराग्राफ भी शामिल हैं . अब ऐसे में क्या कोई अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए बुध्दि लगाएगा  या तुक्का ?यदि बुध्धि लगाये तो  प्रश्न छूटें और अगर तुक्का लगाये तो उसकी  योग्यता  ही संदेह  के घेरे में आ  जाये  .शिक्षकों की योग्यता को सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि प्रश्नपत्रों में नकारात्मक अंकन किया जाये .यदि नकारात्मक अंकन होगा तो वही व्यक्ति चुना जायेगा जिसको विषय का पूर्ण ज्ञान होगा  न कि तुक्का लगाने वाला .साथ ही ज़रूरी नहीं कि जो व्यक्ति अच्छा  लिख सकता है बड़े-बड़े उत्तर दे सकता है वह अच्छा शिक्षक भी हो  .यह  तो स्पीड टेस्ट है निर्धारित  समय में जिसने लिख दिया वो योग्य हो गया और  जो नहीं लिख पाया वो अयोग्य.अब दूसरा पहलू भी देखते हैं कई बार किसी के पास दुनिया भर का ज्ञान होता है और वह एक कुशल वक्ता भी होता है.परन्तु स्पीड टेस्ट में वह निर्धारित समय में लिख नहीं पाता और उसकी सारी काबिलियत पर प्रश्नचिह्न लग जाता है.CCE में तो बच्चों के लिए प्रावधान कर दिया गया कि वह FORMATIVE
ASSESSMENT ( रचनात्मक आंकलन) जिसमें कि लिखने  का कम और बोलने का एवं करने का कार्य अधिक  है में अच्छे  अंक प्राप्त कर अपनी योग्यता प्रमाणित कर सकता है. शिक्षकों कि नियुक्ति के सन्दर्भ में भी यही व्यवस्था लागू  की जा सकती है जिसमें विषय से सम्बंधित बहुवैकल्पिक प्रश्न दिए जा सकते हैं .साथ ही इसमें नकारात्मक अंकन अवश्य हो जिससे उपर्युक्त योग्यता रखने वाले व्यक्ति एवं विषय ज्ञान रखने वाले योग्य व्यक्ति ही चुने  जा सकेंगे. जो कि शिक्षा और शिक्षार्थियों  के लिए बेहतर स्थिति हो सकती है. उदाहरण के लिए पब्लिक SCHOOLS में  मात्र साधारण परीक्षा एवं साक्षात्कार  के आधार पर योग्य शिक्षक नियुक्त किये जाते हैं . और उनकी शिक्षा  की गुणवत्ता किसी से छुपी नहीं है. वहाँ सबसे अधिक ध्यान व्यक्ति के व्यावहारिक ज्ञान पर दिया जाता है, सिद्धांतों पर नहीं. ज़रूरत इच्छाशक्ति की है और सही रूप से प्रावधानों को लागू  करने की. AAJ शिक्षा को सिद्धांतों  की नहीं व्यवहार  की ज़रूरत है. जब तक लोग अपने निजी स्वार्थ को  त्याग कर देश के  लिए  नहीं सोचेंगे ,देश से प्रेम नहीं करेंगे तब तक योजनाओं के अपेक्षित परिणाम शायद ही मिल सकेंगे.

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

JANTA JAB APNI PAR UTAR AATI HAI

जनता जब अपनी पर उतर आती है
तब वो हद से गुज़र जाती है .
अच्छे -अच्छों की हिल जाती हैं कुरसियाँ
शैतान की रूह तक काँप जाती है .

जो समझते हैं जनता को कठपुतली सा -2
जनता उनको छठी का दूध याद दिलाती है .

जनता अग़र राजा बना सकती है,
तो जनता ही  सड़क पर भी  लाती है .

यह बात नहीं ज़रा सी है -२
अभी तो यह शुरुआत है ,फिल्म का   ट्रेलर है -२
 पूरी  पिक्चर तो अभी बाकी है .
अन्ना  हज़ारे ने की है जिस जंग की शुरुआत -२
आगे इसकी जड़े समस्त भारत तक जाती हैं.
                                                                    
                                                ....................सुरेन्द्र   कुमार .........

ANNA HAZARE :SANGHARSH KE AGRADOOT

अब फिरेंगे भ्रष्टाचारी दर -दर मारे,
क्योंकि आ गए हैं अन्ना हजारे.
अब ज़रूर बदलेगा भारत ,
जाएँगे भ्रष्टाचारी जेल सारे.
पास होकर रहेगा जन लोकपाल विधेयक,
क्योंकि भारत साथ है अन्ना तुम्हारे .
अब हमें एकजुट होना ही होगा ,
तभी बदलेंगे कल के नज़ारे .
हम अगर आज चुप रह गए ,
तो कल भ्रष्टाचार के सामने बेबस होंगे ,
बच्चे हमारे .
अब कोई राजनेता नहीं सुधारेगा भारत को ,
हमारा भारत है ,
आओ हम ही इसे सुधारें .
                                                                .......सुरेन्द्र कुमार

                                       


बुधवार, 6 अप्रैल 2011

Saath Nibhana Saathiya : stree ki adarsh chavi par ek sawaliya nishan

स्टार प्लस का यह धारावाहिक भारतीय संस्कृति पर एक कलंक है .इस तरह के धारावाहिकों को प्रसारण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए .यह धारावाहिक लगातार स्त्री की नकारात्मक छवि को ही दिखाता रहता है . इस तरह के धारावाहिक समाज में स्त्रियों की गलत छवि प्रस्तुत करते हैं .माना कि समाज में कुछ स्त्रियाँ  कूटनीति ,षड़यंत्र में भी शामिल है .पर इसका यह मतलब तो नहीं कि कुछ प्रतिशत स्त्रियों की नकारात्मकता का खामियाजा असंख्य स्त्रियों को भुगतना पड़े ? यह भारतीय समाज के लिए बिलकुल भी उचित नहीं कहा जा सकता .इस तरह के धारावाहिकों में स्त्री की आदर्श छवि को दरकिनार कर षड़यंत्र और राजनीति करती स्त्री को ही टी आर  पी की दौड़ में superhit फार्मूला माना जा रहा है .ऐसे धारावाहिक समाज में स्त्रियों के प्रति नकारात्मक सन्देश को प्रसारित करते हैं .जिससे  परिवार में स्त्रियों के  आदर और अहमियत में कमी  आ सकती है और  परिवार टूट  सकते हैं .हद तो तब हो जाती है जब बात को कुछ ज्यादा ही बढ़ा -चढ़ाकर पेश किया जाता है .चलो मान भी लेते हैं कि समाज में ऐसा होता तो मीडिया का फ़र्ज़ हैं वह उसको ज्यादा तूल न देकर उसका इस्तेमाल समाज का परिष्कार करने के लिए करे, न कि छोटी बात को ही धारावाहिक में लम्बा खींच दिया जाये .यह सर्वविदित है कि  मीडिया की सामग्री का लोग अनुकरण करते है .मीडिया चरित्रों  को वो अपना आदर्श मानकर चलते हैं और उन्हीं के जैसा आचरण करने का दिन -रात प्रयास करते हैं .इसलिए अपने फ़र्ज़ को ध्यान में रखते हुए मीडिया को ऐसे चरित्र गढ़ने चाहिए जो समाज को सही दिशा दे सकें .केवल टी आर  पी के लिए धारावाहिकों के कंटेंट को सत्य से दूर बढ़ा-चढ़ाकर ,तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना  भारतीय सामाजिक व्यस्था को गर्त में धकेलने जैसा है.भारतीय  काव्यशास्त्र साहित्य के कई प्रयोजन बताये गए हैं  जैसे धर्म ,अर्थ , काम ,मोक्ष .आज मीडिया को  धर्म और मोक्ष से कुछ लेना देना नहीं रह गया .आज के मनोरंजन चैनल केवल अर्थ (धन) को ही अपना प्रयोजन या उद्देश्य मान बैठे हैं .