दिल्ली में कब सरकार बनेगी ? पता नहीं । कौन दल बनाएगा? पता नहीं। राष्ट्रपति शासन की अवधि उम्मीद से लम्बी हो गई है। बीजेपी अपने पक्ष में माहौल बनाने का पूरा प्रयास कर रही है। छठ का अवकाश घोषित करना , 84 के दंगा पीड़ितों को मुवावजे के तौर पर 5-5 रु लाख देने की घोषणा करना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इसके बावजूद दिल्लीवासियों को मतदान के वक्त इन प्रभावों को स्वयं पर हावी नहीं होने देना चाहिए। एक सजग और सतर्क मतदाता ही स्वस्थ्य लोकतंत्र का आधार है। मतदान करते समय क्षणिक प्रलोभनों के अपेक्षा भावी 5 वर्षों को ध्यान में रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
SAMAJ AUR SARKAR KI SEEMAON KO SAMAJ KE SAMNE LANA HUM SABKA FARZ HAI.TAKI HUM BHARAT KE BHAVISHYA KO UJJWAL BANANE MEIN SAHYOG DE SAKEN.
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014
अरविन्द केजरीवाल : एक अथक पथिक
अरविन्द केजरीवाल :एक योद्धा
उनचास दिनों तक चली अरविंद कि सरकार ने कुछ किया हो या नहीं लेकिन एक बात तो सच है कि आम जनता को जरुर जता दिया कि अगर जनता चाहे तो भ्रष्टाचारियों की नाक में दम कर सकती है , बस चाहिए तो एक सही लीडर। केजरीवाल ने जनता के गुस्से को नेतृत्व दिया और दिल्ली की गद्दी हासिल की. इस उपलब्धि को बहुत हलके में नहीं लेना चाहिए।यह एक बड़े बदलाव की शुरुआत है। इसे आगे ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है। एक अकेले अरविन्द केजरीवाल के बस की ये बात नहीं है। हम केवल आपस में बहस करके भ्रष्ट नेताओं पर अपना गुस्सा निकाल कर रह जाते हैं और अपने-अपने काम में लग जाते हैं। सब ऐसे ही चलता रहता है। हम लाचार होकर मूक बने तमाशा देखते रहते है। क्योंकि भ्रष्ट नेता जानते हैं कि हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तभी हज़ारों आंदोलन अपने अंजाम तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं या शक्ति का प्रयोग करके ख़त्म करवा दिए जाते है। भारत देश की आम जनता को कानून और संविधान की टेक्निकल जानकारी नहीं होती।
इस कारण आम जनता सही जानकारी और तर्कों के साथ अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल नहीं पूछ पाती। जब कोई जानकारी रखने वाला व्यक्ति सत्ता के सच को आम जनता को सरल भाषा में समझाकर जागरूक करने का प्रयास करता है तो राजनीती के गलियारों में खलबली मच जाती है। जनता की समझ को सीमित रखने में अंग्रेजी भाषा का भी अहम् योगदान है। सभी अहम् जानकारियाँ अदालतों के फैसले अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो पाते हैं। अब आम जनता को अपनी मातृभाषा तक में पढ़ने का सही मौका नहीं मिल पा रहा तो फिर अंग्रेजी सीखने -सिखाने की किसे फिक्र है? केजरीवाल ने जो शुरुआत की है वो बिलकुल सही है। परन्तु कुछ कमियां भी हैं। जैसे - मीडिया से रुबरु होने वाले प्रवक्ता कई बार भावावेश में आकर ऐसी बात कह जाते हैं जिससे विरोधियों के निशाने पर आ जाते हैं, कोई भी प्रवक्ता कभी भी कुछ भी बोल देता है फिर बाद में माफ़ी माँग लेता है , आंदोलन में शामिल लोगों के बिजली के बिलों में आधी कटौती करने का फैसला भी गलत है, क्योंकि पार्टी को वोट तो लाखों ने दिया था फिर सबके बिलों में कटौती होनी चाहिए थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिल्ली के स्टूडेंट्स को आरक्षण का फैसला भी सही नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ऐसे कदम से पार्टी की राष्ट्रीय सोच प्रकट नहीं होती है। सभी अस्थायी कर्मियों को तुरंत स्थायी करने का आश्वासन देना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दिल्ली के स्कूलों में कार्य के घंटे बढ़ाने का कदम भी उचित नहीं कहा जा सकता। हालाँकि RTE. में इसका प्रावधान है ऐसा कहा जाता है। लेकिन ज़रूरी यह है कि सरकारी स्कूलों में भी पब्लिक स्कूल जैसी सुविधाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाए।
काम के घंटे बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं है। इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। मानसिक थकान ज्यादा होने से उनकी रचनात्मक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इन सब बातों का ध्यान केजरीवाल को भविष्य में रखना चाहिए। इस्तीफा देने के बाद इन बातों पर गौर करना बहुत ज़रूरी है कि आप राजनीती में थोड़ी चाणक्यनीति भी मिलाये और ऐसे लोगों को पार्टी का प्रवक्ता बनाये जोकि तर्क देने में ,बोलने में माहिर हों , भाषण शैली प्रभावशाली हो। जिनके बोलने में धाराप्रवाहिता हो ,जोश हो। जिनकी भाषा पैनी हो।
यह सब गुण भी टिके रहने और अपना काम ईमानदारी से करने के लिए ज़रूरी हैं।बोलने की कला में ही BSP. उत्तर प्रदेश में पीछे रह गई हज़ारों बेघरों को मकान देने, अपराधियों पर लगाम लगाने के बावजूद मूर्तियां बनवाने का मुद्दा विरोधियों ने खूब उछाल दिया और BSP. के नेता सही जवाब नहीं दे पाये। और मात्र लैपटॉप का वादा करके सपा ने अपनी सरकार बना ली।
अरविंदजी , आपका इस्तीफ़ा देने का फैसला बिलकुल सही है। समर्थन की बैसाखी से जनलोकपाल का एवरेस्ट फतह नहीं किया जा सकता।
भविष्य की सफलताओं के लिए मेरी शुभकामनाएं।
रविवार, 8 दिसंबर 2013
बदलाव की धारा
बदलाव का आगाज़
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिला जनसमर्थन किसी बड़े राजनीतिक
बदलाव की ओर संकेत है। ये इस बात की ओर इशारा है कि अभी तक जनता दो में से किसी एक को ही चुनती आ रही थी , चाहे उसे दोनों पसंद हो या नहीं। क्योंकि जनता के पास अन्य ईमानदार विकल्प ही मौजूद नहीं थे। लेकिन जैसे ही उसे विकल्प मिला उसने (जनता ने) अपनी वास्तविक इच्छा जाहिर कर दी। दिल्ली का चुनाव परिणाम इस दृष्टि से भी महत्त्व पूर्ण है कि न्यूनतम साधनों से भी अधिकतम परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। चुनावों में बढ़ते धन और बल के प्रभाव के बीच आम आदमी पार्टी की शानदार उपस्थिति राजनीति को एक नयी दिशा देती है।
जो जनता खुले तौर पर अपना गुस्सा प्रकट नहीं कर पा रही थी उसे अपने गुस्से की अभिव्यक्ति के लिए एक विकल्प मिल गया है। उम्मीद है यह बदलाव ईमानदार और ईमानदारी को साथ लेकर चलते हुए दिल्ली से आगे राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक जनसमर्थन जुटाते हुए एक नए भारत का निर्माण करेगा। आज भारत इंडिया और भारत में बँट गया है। एक शासक और दूसरा शासित की भूमिका में है। दोनों के बीच दूरी बढ़ती ही जा रही है। आज इस दूरी को समाप्त करने की ज़रूरत है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी भारत शिक्षा,स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर भी काबू नहीं कर पाया क्योंकि देश में जो विकास हुआ वह देश केंद्रित कम और चुनाव केंद्रित ज्यादा रहा। यह हम सभी जानते है कि देश केंद्रित विकास चुनाव के पांचों वर्ष सामान रूप से चलता रहता है जबकि चुनाव केंद्रित विकास चुनाव के नजदीक आते ही शुरू होता है बाकी समय उसे देश से कुछ लेना-देना नहीं होता।जनता को भी चाहिए कि चुनाव के समय व्यक्ति को देखे पार्टी को नहीं। पार्टी को देखते समय हम भावनाओं में भी बह सकते हैं। इसलिए दिमाग से काम लेने की ज़रूरत है। देश की जनता को पता होना चाहिये कि राजनेता चुनाव जीतने के लिए अपने तेज़ दिमाग का ही इस्तेमाल कर जीत हासिल करने की रणनीतियां बनाते हैं। और जनता से भावुक होकर मतदान करने की उम्मीद करते है। जनता को भी चाहिए कि वह वह भावनाओं में न बहकर भाषा,जाति ,धर्म ,संप्रदाय ,अमीर -गरीब की सोच से ऊपर उठकर एक जिम्मेदार ,समझदार भारतीय होने का गौरव धारण करते हुए अपने दिल की नहीं दिमाग की सुनते हुए सही व्यक्ति को अपना जनप्रतिनिधि चुने। प्रमाण के तौर पर आप तीस-चालीस वर्ष पुरानी कोई भी मूवी देख लीजिये आपको महँगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी की पीड़ा सुनाई दे जायेगी। और आज भी आम आदमी इसी से परेशान हैं। तो क्या परिवर्तन हुआ इतने वर्षों में ? आप खुद ही सोच लीजिये। अब भावनाओं में बहने की नहीं दिमाग से सही फैसले का समय है। अब मौन रहने का नहीं, सवाल करने का समय है।
मंगलवार, 5 नवंबर 2013
सोमवार, 28 अक्टूबर 2013
सहायक आचार्य :
सहायक आचार्य बनने का सपना
विश्वविद्यालयों द्वारा सहायक आचार्यों की नियुक्ति हेतु जो स्क्रीनिंग का तरीका अपनाया जा रहा है। उसे कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके मुताबिक न्यूनतम योग्यता रखने वाला योग्य उम्मीदवार भी अयोग्य हो जाता है,अगर उसने पीएचडी /एम. फिल/अनुसन्धान कार्य/प्रकाशन कार्य न किया हो। एसोसिएट प्रोफ़ेसर /प्रोफ़ेसर की नियुक्ति के लिए तो यह स्क्रीनिंग उचित एवं अनिवार्य ठहराई जा सकती है। परन्तु शिक्षण में किसी योग्य उम्मीदवार के प्रवेश करने के स्तर पर यह स्क्रीनिंग एक बाधा से अधिक कुछ नहीं है। यदि इसे उचित मान भी लिया जाये तो इससे 'यू जी सी नेट' जैसी योग्यता परीक्षा की अनिवार्यता
और महत्त्व पर ही सवालिया निशान लग जायेगा। क्योंकि इस स्क्रीनिंग में इस परीक्षा को न्यूनतम महत्त्व दिया गया है। उदाहरण के लिए- नेट जे आर एफ के लिए ३/५ अंक स्क्रीनिंग में दिए गए हैं ,वहीँ एम् फिल/पीएचडी धारकों को अधिकतम १७ अंक दिए जा रहे हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि यदि आपके पास एम् फिल ,पीएचडी की उपाधि है , आपने अनुसन्धान कार्य किया है , आपकी पुस्तके प्रकाशित हुई हैं तो आपके चयन के अवसर ज्यादा हैं। मात्र स्नाकोत्तर उपाधि और नेट के आधार पर आपका सहायक आचार्य बनने का सपना मात्र दिवास्वप्न ही है। लगता है कि ऐसा मान लिया गया है कि अनुसन्धान कार्य का अनुभव रखनेवाला, पुस्तकों का लेखक ही विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षक बनने का असल हकदार है अन्यथा इस तरह की स्क्रीनिंग की बजाय एक लिखित एवं नकारात्मक अंकन के प्रावधान वाली परीक्षा के आधार पर योग्य उम्मीदवारों को साक्षात्कार हेतु चुना जा सकता था। हम सभी जानते हैं कि बारहवीं तक पढ़ाने के लिए बी एड अनिवार्य योग्यता है। मात्र एक कक्षा ऊपर आते ही अनुसन्धायकों का महत्त्व अचानक बढ़ जाता है और शिक्षण -प्रशिक्षण योग्यता का घट जाता है। अनुसंधायक अच्छे शिक्षक हो सकते है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि स्नातकोत्तर उपाधि रखने वाला अच्छा शिक्षक नहीं हो सकता जो उसे सबसे निचले पायदान पर डाल दिया गया है। यह वास्तव में अवसर दिए बिना किसी को अयोग्य मान लेने जैसा है। अगर हम दिल्ली विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में देखें तो हम पाते हैं कि यहाँ पर प्रवेश ही अधिकतम प्राप्तांक के आधार पर होते हैं। प्रत्येक शिक्षा बोर्ड /विश्वविद्यालय के उच्चतम प्राप्तांक धारकों को ही प्रवेश मिल पाता है। मतलब भारत भर के बोर्ड/विश्वविद्यालयों के चुनिंदा विद्यार्थी ही प्रवेश पाने में सक्षम हो पाते है। ऐसे में कई मायनों में वे सब पहले से ही मेहनती , बुद्धिमान होते हैं। उनमें आप कितना सुधार लायेंगे और क्या पढ़ाएंगे ? पब्लिक स्कूल से निकले ये विद्यार्थी पहले से ही साधन संपन्न होते हैं। जिनको कि हम इंग्लिश माध्यम से पढ़ाते हैं। जिनमें वास्तव में सुधार की जरुरत है वे है हिंदी माध्यम के छात्र। जिनको पढ़ाने में ही अनुसंधायकों की वास्तविक योग्यता का परीक्षण हो सकता है ,उनके लिए तो पुस्तकें तक उपलब्ध नहीं करवाई जाती। इन अभावग्रस्त लोगों को ही ज्ञान के भण्डार की असल ज़रूरत है क्योंकि 'अभाव में ही भाव पैदा होता है।' इस कसौटी पर ही अनुसंधायकों के ज्ञान का परीक्षण हो सकता है। बाकायदा इस पर अनुसन्धान कार्य भी होना चाहिए कि "एक अनुसंधकर्ता ही प्रभावशाली सहायक आचार्य हो सकता है।"
आज वास्तव में इस परिकल्पना के परीक्षण एवं शोध द्वारा इसकी सार्थकता सिद्ध करने की ज़रूरत है। अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें : http://duugrg.du.ac.in/du/index.php?page=rules
रविवार, 29 सितंबर 2013
जनता की भाषा और भारत की तरक्की
भारत के विकास कि सबसे बड़ी बाधा है. लोगों की मातृभाषा की बजाय अंग्रेजी भाषा में महत्त्वपूर्ण जानकारी का उपलब्ध होना .जब लोगों को जानकारी ही नहीं होगी .तो वो भला किससे और किस हक की बात कर पाएंगे?
उच्च शिक्षा पर अंग्रेजी काबिज है और आम इंसान अपनी मातृभाषा में
ही उलझा हुआ है. मातृभाषा में उच्च शिक्षा उपलब्ध न होने का ही परिणाम है कि तकनीकी विषयों में रुचि रखने वाला और तकनीक के व्यावहारिक पक्ष का गहन जानकार बालक इंजीनियर बनने की बजाय
किसी मैकेनिक की दुकान पर २००० रु महीने पर अपने भविष्य को
उज्जवल बनाने का असफल प्रयास कर रहा होता है.
गार्डनर के MULTIPLE INTELLIGENCE सिद्धांत की यहाँ पर हवा निकल
जाती है. जब तक अंग्रेजी के जानकार भारतीय, अपने देश की जनता के हित के लिए विदेशी ज्ञान -विज्ञान को भारत की भाषाओं में उपलब्ध
करवाने में देशभक्ति की अनुभूति नहीं करेंगे तब तक ज्ञान-विज्ञान और
भारत की तकनीकी प्रगति में आम भारतीय मात्र एक उपभोक्ता ही बना रहेगा. उत्पादन का भागीदार कभी भी नहीं बन पाएगा. आज भारतीय
बाज़ार पर चाइना काबिज होता जा रहा है. दीवाली के सामान ,रक्षाबंधन की राखियां ,होली की पिचकारियाँ .क्या ये सब हम खुद नहीं बना सकते ?
या दुनिया के लिए बस बाज़ार ही उपलब्ध करवाते रहना हमारा काम रह गया.उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षक पूर्ण रूप से अंग्रेजी भक्त बने हुए हैं.
समझ नहीं आता कि ये सम्माननीय समूह अंग्रेजी का प्रसार कर रहा है या ज्ञान -विज्ञान का ? इन संस्थानों में मातृभाषा के विद्यार्थियों को उन्हीं
के हाल पर छोड़ दिया जाता है. भई, ये लो अंग्रेजी में लिखे नोट्स ,बस हम इतना ही कर सकते हैं. आगे तुम्हे देखना है कि इन्हें कैसे समझोगे. क्लास में तो इंग्लिश में ही लेक्चर होंगे. हाँ,परीक्षा हिंदी में या अपनी भाषा में
दे सकते हो. अब कितनी विकट स्थिति है ये. एक शिक्षक जो कि उस विषय का विशेषज्ञ है , अपना पल्ला झाड रहा है. जबकि उसे ज्यादा ही
जानकारी है.बस ज़रूरत है तो देशप्रेम और इच्छाशक्ति की. जब भारतीयों को ही अपनी भाषा बोलने में झिझक महसूस होने लगे तो किसी विदेशी
को इन सबके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है.
अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा को सीखने पढ़ने में कोई बुराई नहीं है.
महत्त्वपूर्ण यह है कि आपने अपने देश के आम लोगों तक क्या यह ज्ञान पहुँचाया ? अपनी मातृभाषा में उस सीखे हुए ज्ञान को पहुँचाने के लिए आपने क्या किया ? नीचे दिए गए लिंक पर जाएँ :
lhttp://mittal707.jagranjunction.com/201http://mittal707.jagranjunction.com/2013/09/25/%E0%A4%90%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF/
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