शनिवार, 8 नवंबर 2014

कागजों की बर्बादी

कागजों की बर्बादी के लिए बड़े-बड़े नामी शैक्षिक संस्थान भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। पाठ्यक्रम में निर्धारित शीर्षकों की सूची छात्र-छात्राओं को दे दी जाती है । सभी छात्र जाते हैं लायब्रेरी में और छाँट -छाँटकर शीर्षक निकालते हैं और फिर शुरू हो जाता है कभी न थमने वाला फोटोस्टेट का दौर जो वर्षपर्यंत सतत चलता रहता है। और प्रोफे्सर इस ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं। इस प्रकार छात्रों के पैसे और असीमित कागजों की बर्बादी साल दर साल होती रहती है साथ प्राणवायु के स्रोत वृक्ष भी दम तोड़ते रहते हैं। यह तो हुई समस्या। अब बात करते हैं समाधान की। पाठयक्रम में निर्धारित विषय विशेष के जितने भी आवश्यक शीर्षक हैं पाठयक्रम निर्माताओं को उस शीर्षक के विशेषज्ञ द्वारा लिखित सामग्रियों को इकठ्ठा कर एक पुस्तक का रूप दे देना चाहिए । इससे प्रत्येक छात्र को विषय से सम्बद्ध ज़रूरी, सटीक एवं प्रामाणिक सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाएगी जिससे वे अनावश्यक फोटोस्टेट नहीं करवाएँगे। क्योकि उनको आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रूप में एक ही पुस्तक में मिल जाएगी। जिसे खुद विषय के शिक्षकों ने तैयार किया है। इस कारण छात्रों के लिए यह बहुत उपयोगी होगी। यदि कोई छात्र अतिरिक्त जानकारी चाहते हैं तो उनके लिए लायब्रेरी में पर्याप्त मात्रा में शिक्षको द्वारा अनुमोदित अतिरिक्त पुस्तकें भी होनी चाहिए। फिर फ़ोटो स्टेट की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।यकीन मानिए बेवजह फोटोस्टेट के कारण करोड़ों पेज़ बर्बाद होते हैं और लाखों पेड़ कटते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के पटेल चेस्ट इलाके में कदम-कदम पर फोटोस्टेट की ऐसी अनेक दुकाने सजी हैं जो दिन रात इस काम को अंजाम देती हैं।और लाखों पेज फोटोस्टेट करती हैं। क्या केंद्रीय शिक्षा मंत्री महोदया को इस सन्दर्भ में कोई कदम उठाना चाहिए ?

जागो जनता जागो !

प्रतिनिधि चुनते समय लहर की बजाय अपने अपने शहर और उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखना अधिक ज़रूरी हैं। एक व्यक्ति बहुत अच्छा है पर ज़रूरी नहीं उनके नाम का सहारा लेने वाला हर व्यक्ति भी उन्हीं की तरह समर्पित हो। दिल्ली के सफाई अभियान को हम इस सन्दर्भ में देख चुके हैं। सहारा लेने वाले व्यक्ति की क्या अपनी कोई उपलब्धि या पहचान नहीं है जिसके आधार पर वो जनता के सामने सिर उठाकर जा सके। जबकि आखिरकार जनता के बीच उसे ही रहना और काम करना है। इस बारे में आम जनता को सोच समझकर फैसला करने की ज़रूरत है। क्योंकि किसी भी फैसले में भावना और बुद्धि का उचित सामंजस्य होना चाहिए। एक तरफ हम भावना में बहकर अपने पैर पर खुद की कुल्हाड़ी मार लेते हैं तो दूसरी तरफ अत्यधिक बुद्धि प्रेरित होना हमें स्वार्थी बनाता है। हम भारतीय लोग भावनाओं में बहुत जल्दी बहकर किसी की बात पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं। पर अब भावना पर बुद्धि का नियंत्रण स्थापित कर उचित निर्णय लेने का वक़्त है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह बात अब समझनी ही होगी अन्यथा हम अपने छोटे छोटे सपनों को यूँ ही मरते देखते रहेंगे।

रविवार, 2 नवंबर 2014

सुखी जीवन

अपनी आदतों को सही करके अपने भाग्य के ग्रहों को बदले- [१] मुख्य द्वार के पास कभी भी कूड़ादान ना रखें इससे पड़ोसी शत्रु हो जायेंगे | [२] सूर्यास्त के समय किसी को भी दूध,दही या प्याज माँगने पर ना दें इससे घर की बरक्कत समाप्त हो जाती है | [३] छत पर कभी भी अनाज या बिस्तर ना धोएं..हाँ सुखा सकते है इससे ससुराल से सम्बन्ध खराब होने लगते हैं | [४] फल खूब खाओ स्वास्थ्य के लिए अच्छे है लेकिन उसके छिलके कूडादान में ना डालें वल्कि बाहर फेंकें इससे मित्रों से लाभ होगा | [५] माह में एक बार किसी भी दिन घर में मिश्री युक्त खीर जरुर बनाकर परिवार सहित एक साथ खाएं अर्थात जब पूरा परिवार घर में इकट्ठा हो उसी समय खीर खाएं तो माँ लक्ष्मी की जल्दी कृपा होती है | [६] माह में एक बार अपने कार्यालय में भी कुछ मिष्ठान जरुर ले जाएँ उसे अपने साथियों के साथ या अपने अधीन नौकरों के साथ मिलकर खाए तो धन लाभ होगा | [७] रात्री में सोने से पहले रसोई में बाल्टी भरकर रखें इससे क़र्ज़ से शीघ्र मुक्ति मिलती है और यदि बाथरूम में बाल्टी भरकर रखेंगे तो जीवन में उन्नति के मार्ग में बाधा नही आवेगी | [८] वृहस्पतिवार के दिन घर में कोई भी पीली वस्तु अवश्य खाएं हरी वस्तु ना खाएं तथा बुधवार के दिन हरी वस्तु खाएं लेकिन पीली वस्तु बिलकुल ना खाएं इससे सुख समृद्धि बड़ेगी | [९] रात्रि को झूठे बर्तन कदापि ना रखें इसे पानी से निकाल कर रख सकते है हानि से बचोगें | [१०] स्नान के बाद गीले या एक दिन पहले के प्रयोग किये गये तौलिये का प्रयोग ना करें इससे संतान हठी व परिवार से अलग होने लगती है अपनी बात मनवाने लगती है अतः रोज़ साफ़ सुथरा और सूखा तौलिया ही प्रयोग करें | [११] कभी भी यात्रा में पूरा परिवार एक साथ घर से ना निकलें आगे पीछे जाएँ इससे यश की वृद्धि होगी | ऐसे ही अनेक अपशकुन है जिनका हम ध्यान रखें तो जीवन में किसी भी समस्या का सामना नही करना पड़ेगा तथा सुख समृद्धि बड़ेगी | जो भी मित्र अपनी कुंडली की जानकारी बिना किसी रत्न केचाहते हैं वो अपना जन्म तारीख समय और जिला का नाम भेजे अपनी श्रद्धा अनुसार दक्षिणा दे और उसका समाधान आयुर्वेद योग वास्तु रंग भोजनऔर व्यवहार द्वारा प्राप्त करने के लिए संपर्क करे 09334913911 --- via #MMSSamvaad

विक्स का सच

सुबह का नमस्कार मित्रों मित्रो भारत मे एक विदेशी कंपनी हैं प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी )| जो भारत मे vicks vaporub नाम की एक दवा बेचती है | क्या आप जानते हैं VICKS नाम की दावा अमेरिका में बनाना और बेचना दोनों जुर्म है | WHO (world health organisation ) ने खुद इसे जहर घोषित किया है | आप google पर भी " vicks vaporub banned " लिख कर search कर सकते हैं | https://www.google.co.in/#q=vicks+vaporub +banned+by+who बच्चे को खांसी आई नहीं कि उसके गले पर या तो विक्स मल दी गई या फिर उसे विक्स की गोली चूसने को दे दी गई। लेकिन अब विक्स का इस्तेमाल न करें। अमेरिका मे अगर किसी डॉक्टर ने किसी को VICKS vaporub की prescription लिख दे तो उस डॉक्टर को 14 साल की जेल हो जाती है, उसकी डिग्री छीन ली जाती है क्यूंकि की vicks vaporub जहर है, ये आपको दमा, अस्थमा, ब्रोंकिअल अस्थमा कर सकता है | इसीलिए दुनिया भर में WHO और वैज्ञानिको ने इसे जहर घोषित किया और ये जहर भारत में सबसे ज्यादा बिकता है विज्ञापनो की मदद से | लेकिन क्या आप जानते हैं ? भारत मे एक कानून है ? उस कानून के अनुसार किसी भी दवा का विज्ञापन टीवी, अखबार, या किसी भी मैगजीन पे नही दिया जा सकता ; लेकिन इसके बावजूद भी पैसे के ताकत से, घूसख़ोरी से ये सब होता है और दवाईयों के विज्ञापन लगातार टीवी, अखबारों आदि मे दिखाये जाते हैं | इस प्रोडक्ट को बनाने वाली कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी) ने अमेरिका में अपनी इस दवा को वापस ले लिया है यानी कंपनी इस दवा को अब अमेरिकन बाजार में नहीं बेचेगी। इस कंपनी ने सिर्फ विक्स ही नहीं बल्कि अपना एक और प्रॉडक्ट 24 लिक्वि कैप्स बोनस पैक भी वापस ले लिया है। पर...भारत समेत दुनिया के विकासशाली देशों यानी गरीब देशों में दोनों दवाओं को वापस नहीं लिया गया। क्यों वापस लिया विक्स को प्रॉक्टर एंड गैंबल (Procter and Gamble)ने अपनी प्रेस रिलीज में कहा है कि इस दवा को इसके दावे के अनुरूप नहीं पाया गया। कंपनी ने विक्स (Vicks) के पैकेट पर लिखा था कि यह दवा १२ साल से कम उम्र के बच्चों पर काफी तेजी से असर करती है लेकिन कंपनी ने पाया कि ऐसा नहीं है। इसका असर बच्चों पर नहीं होता। ठीक यही नतीजा क्वि कैप्स के साथ भी निकला । कंपनी ने अपनी रिलीज में यह भी कहा कि उसने खुद ही पहल करते हुए दोनों दवाओं को वापस लिया है। यानी उसने पहल को भी अमेरिकन लोगों के बीच भुनाने का पूरा इंतजाम किया है। संकेत यह देने की कोशिश की जा रही है कि यह कंपनी कितनी ईमानदार है कि इसने अपने दो प्रोडक्ट बेहतर नतीजे न आने पर वापस ले लिए । हकीकत यह है कि अमेरिका में फूड एंड ड्रग कंट्रोलर अथॉरिटी के नियम इतने कड़े हैं कि उसके आगे कंपनियों के दावों की असलियत खुल जाती है । यह अथॉरिटी ऐसी दवाओं और वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाते देर नहीं करती । इसके अलावा वहां इस क्षेत्र में कई एनजीओ भी सक्रिय हैं जो लगातार ऐसी वस्तुओं पर नजर रखते हैं और अथॉरिटी को सूचना देते रहते हैं। वैसे भी वहां की अथॉरिटी की वेबसाइट पर जाकर कोई भी आदमी किसी भी प्रोडक्ट की शिकायत कर सकता है । मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के बाद भारत जिस अमेरिकी गुलामी की तरफ बढ़ रहा है, प्रॉक्टर एंड गैंबल की घटना उसकी जीती जागती मिसाल है। यह अमेरिकी कंपनी है और करीब 80 देशों में इसकी शाखाएं हैं यानी वहां भी पी एंड जी की यूनिट है जो इस फॉर्मूले के आधार पर विक्स और 24 लिक्वि कैप्स बनाती है। इन 80 देशों की शाखाओं में करीब 1 लाख 35 हजार लोग नौकरी करते हैं । भारत में इस समय हर छोटी से लेकर बड़ी जिस भी चीज का इस्तेमाल आप करते हैं, उनमें कहीं न कहीं किसी भी रूप में अमेरिकन हस्तक्षेप बरकरार है । यानी टाटा नमक की तरह अमेरिका हमारे हर निवाले में मौजूद है। खासकर दवाओं के मामले में तो यह आश्चर्यजनक ढंग से मौजूद है। याद कीजिए टीवी पर आपने जब पहली बार विक्स का विज्ञापन देखा था तो वह क्या था – गले में खिचखिच...विक्स की गोली लो खिचखिच दूर करो । कितना आकर्षित करता था यह विज्ञापन आपको । लेकिन अब जब उसकी असलियत सामने आई है तो हम लोग मुंह चुराने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। विक्स को वापस लेने की खबर अमेरिकन मीडिया से मिली है, भारतीय मीडिया में यह खबर नजर नहीं आई है। हो सकता है कि एकाध अंग्रेजी अखबारों ने इसे कहीं संक्षेप में लगाया भी हो। कहने का आशय यह है कि भारत के एक बहुत बड़े वर्ग तक यह खबर कभी नहीं पहुंच पाएगी कि विक्स और 24 लिक्वि कैप्स अब अमेरिका में नहीं बेची जाएगी। लोग हमेशा की तरह खिचखिच दूर भगाने के लिए विक्स खाते रहेंगे । नाम में फर्क - अमेरिका में विक्स को विक्स डे क्विल कोल्ड एंड फ्लू के नाम से बेचा जाता है। भारत में यह विक्स वेपोरब, विक्स कफ ड्रॉप्स, विक्स एक्शन 500 प्लस के नाम से बेचा जाता है। पी एंड जी के जो अन्य पॉपुलर प्रॉडक्ट पूरी दुनिया में बिकते हैं वे हैं- पैंपर्स, टाइड, एरियल, आलवेज, विहस्पर, पैंटीन, मैच 3, बाउंटी, डॉन, गेन, प्रिंगेल्स, चारमिन, डाउनी, लेनोर, इयाम्स, क्रेस्ट, ओरल-बी, ड्यूरासेल, ओले, हेड एंड शोल्डर, वेल्ला, जिलेट आदि। इनमें से आपने जरूर किसी न किसी प्रोडक्ट का इस्तेमाल भारत में भी किया होगा । कोई एक दवा नहीं - विक्स या 24 लिक्वि कैप्स कोई एक दवा नहीं है जिसका अमेरिकी चेहरा अलग है और भारत जैसे गरीब देशों के लिए उसका पैमाना अलग है। तमाम ऐसी प्रतिबंधित दवाएं जो अमेरिका में नहीं बेची जा सकतीं, वह भारत में खुलेआम बिकती हैं। यहां के डाक्टर दवा कंपनियों से गिफ्ट और टूर के कूपन लेकर उन दवाओं को खरीदने की सिफारिश (रेकमेंड) करते हैं । सिफला एक भारतीय कंपनी है। अभी जब स्वाइन फ्लू फैला तो उसने एक बहुत ही कारगर दवा टेमीफ्लू भारतीय मार्केट में उतारी। चूंकि स्वाइन फ्लू सबसे पहले अमेरिका में फैला तो वहां की सरकार ने सबसे पहले वहां की कंपनियों से स्वाइन फ्लू की दवा के बारे में पड़ताल की। सभी ने हाथ खड़े कर दिए। सिफला ने अमेरिकन सरकार को बताया कि उसके पास बहुत ही कारगर दवा है। अमेरिका ने सिफला को दवा सप्लई का आर्डर दे दिया। वहां दवा पहुंचने की देर थी कि एक अमेरिकन कंपनी ने इससे मिलती-जुलती दवा बनाकर पेटेंट का दावा कर दिया। खैर वह केस सिफला ने जीता और अब टेमीफ्लू के मामले में उसका डंका बज रहा है। यहां भारत में टेमीफ्लू की सप्लाई के लिए सिफला को भारत सरकार से बार-बार गुहार लगानी पड़ी कि हमारी दवा खरीद लो और पब्लिक में बांट दो। यह उदाहरण मैंने सिर्फ इसलिए दिया कि अगर किसी अमेरिकी कंपनी को भारत सरकार के पास यह दवा बेचनी होती तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनीसेफ, रोटरी क्लब जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उसकी पैरोकारी में उतर आतीं। लेकिन सिफला की पैरोकारी किसी ने नहीं की, यहां तक कि भारतीय मीडिया ने भी नहीं। न यहां न वहां । जुकाम और सिरदर्द के इलाज में काम आने वाली दवा विक्स वैपोरब बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है। एमएसएनबीसी अध्ययन रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है।शारीरिक सुकून के लिए नाक और तलवे में विक्स वैपोरब रगड़ा जाता है। एमएसएनबीसी न्यूज नेटवर्क की इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि यह दवा बच्चों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। इससे बच्चों के शरीर के उस हिस्से में जलन हो सकती है जहां विक्स वैपोरब दवा लगाई जाती है। इस मरहम से बच्चों में सांस संबंधी जटिलाएं पैदा हो सकती हैं। इससे श्लेश्म झिल्ली पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। उत्तरी कैरोलिना में वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसीन के बाल रोग विभाग के उप प्रमुख ब्रुस के। रूबिन को इस रिपोर्ट में यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, छोटे बच्चे के लिए यह दवा अति संवेदनशील साबित हो सकती है। इससे बच्चों की सांस नली सिकुड़ सकती है। कई मामले में यह मरहम सांस नली को खतरनाक तरीके से जाम कर सकता है। उनका मानना है कि यह मरहम लोगों में यह गलतफहमी पैदा कर देती है कि उनकी सांस नली पूरी तरह साफ हो गई है, पर ऐसा होता नहीं है। इस मरहम में मेंथॉल नामक रसायन होता है। vicks पेट्रोलियम जेल्ली से बनता है जिसकी कीमत ६०-७० रुपया किलो है और विक्स की बिक्री में procter and gamble कंपनी को २०,००० % से जादा का मुनाफा है | ये मुनाफा आप की जेब से लूटा जा रहा है और सरकार इस घोटाले में शामिल है | सरकार ने लाइसेन्स दे रखी है, आँखे बंद कर रखी है और कंपनी देश को लूटा जा रहा है और ये vicks vaporub नाम की दवा कितनी महंगी आपको बेची जाती है | २५ ग्राम ४० रूपये की है तो ५० ग्राम ८० रूपये की तो १०० ग्राम १६० रूपये की मतलब १ किलो vicks की १६०० रूपये हुई | १६०० रूपये किलो का जहर खरीद आप खुद लगा रहे हैं और अपने बच्चों को लगा रहे हैं | जिससे आपको दमा, अस्थमा, ब्रोंकिअल अस्थमा TB हो सकता है | सर्दी खांसी की आयुर्वेद मे बहुत अच्छी दवा है उसका नाम है | दालचीनी (ध्यान रहे ये दालचीनी आम घरो मे होने वाली आम दाल और चीनी नहीं है ) http://hi.wikipedia.org/wiki/दालचीनी | इस दालचीनी को पीस ले और एक चम्मच शहद के ऊपर कुछ चुटकी डाले और सीधा निगल जाएँ बहुत ही ज्यादा लाभकारी हैं | अगर किसी को गले मे ज्यादा दर्द हो या tonsils की समस्या हो तो आप एक चुटकी शुद्ध हल्दी बिलकुल गले मे घंटी की पास रखे मात्र 3 दिन करने से आपको बहुत अधिक लाभ होगा | और अगर आपको गले की खिचखिच दूर ही करनी है तो गरम पानी में तुलसी, अदरक और मामूली सा नमक डालकर उसका गलाला करें और उस पानी को पी लें। आपकी खिचखिच जरूर दूर हो जाएगी । इस vicks नाम के जहर को घर से बाहर फेंके और RTI माध्यम से सरकार से सवाल करे की अगर ये अगर अमेरिका मे ban है तो भारत मे क्यूँ बिक रही है | एक भाई ने २८ जनवरी २०१३ को RTI की website पर सवाल भी पूछा था लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया | http://www.rtiindia.org/forum/109125-rti-vicks- vaporub-p-g-banned-worldwide.html आपने पूरी post पढ़ी बहुत बहुत धन्यवाद १. http://www.youtube.com/watch?v=ZH9KSgJK oQE २. http://www.hoaxorfact.com/Health/ban-vicks- save-life.html ३. http://www.bluelight.org/vb/threads/133538- The-More-You-Know-How-much-Vicks-Vaporub- would-it-take-to-kill-a-man ४. http://www.scientificamerican.com/blog/post/ warning-vicks-vaporub-bad-for-tots-2009-01-12/ ?id=warning-vicks-vaporub-bad-for-tots-2009-01 -12 --- via #NavyugSamvaad --- via #MMSSamvaad

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

दिल्ली में सरकार : एक उलझी पहेली

दिल्ली में कब सरकार बनेगी ? पता नहीं । कौन दल बनाएगा?  पता नहीं। राष्ट्रपति शासन की अवधि उम्मीद से लम्बी हो गई है। बीजेपी अपने पक्ष में माहौल बनाने का पूरा प्रयास कर रही है। छठ का अवकाश घोषित करना , 84 के दंगा पीड़ितों को मुवावजे के तौर पर 5-5 रु लाख देने की घोषणा करना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।  इसके बावजूद दिल्लीवासियों को मतदान के वक्त इन प्रभावों को स्वयं पर हावी नहीं होने देना चाहिए। एक सजग और सतर्क मतदाता ही स्वस्थ्य लोकतंत्र का आधार है। मतदान करते समय क्षणिक प्रलोभनों के अपेक्षा भावी 5 वर्षों को ध्यान में रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

अरविन्द केजरीवाल : एक अथक पथिक

अरविन्द केजरीवाल :एक योद्धा

उनचास दिनों तक चली अरविंद कि सरकार ने कुछ किया हो या नहीं लेकिन एक बात तो सच है कि आम जनता को जरुर जता दिया कि अगर जनता चाहे तो भ्रष्टाचारियों की  नाक में दम कर सकती है , बस चाहिए तो एक सही लीडर। केजरीवाल ने जनता के गुस्से को नेतृत्व दिया और दिल्ली  की गद्दी हासिल की. इस उपलब्धि को बहुत हलके में नहीं लेना चाहिए।यह एक बड़े बदलाव की  शुरुआत है। इसे आगे ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है। एक अकेले अरविन्द केजरीवाल के बस की  ये बात नहीं है। हम केवल आपस में बहस करके भ्रष्ट नेताओं पर अपना गुस्सा निकाल कर रह जाते हैं  और अपने-अपने काम में लग जाते हैं। सब ऐसे ही चलता रहता है। हम लाचार होकर मूक बने तमाशा देखते रहते है। क्योंकि भ्रष्ट नेता जानते हैं कि हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तभी हज़ारों आंदोलन अपने अंजाम तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं या शक्ति का प्रयोग  करके ख़त्म करवा दिए जाते है। भारत देश  की आम जनता को कानून और संविधान की टेक्निकल जानकारी नहीं होती।

 इस कारण आम जनता सही जानकारी और तर्कों के साथ अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल नहीं पूछ पाती। जब कोई जानकारी रखने वाला व्यक्ति सत्ता के सच को आम जनता को सरल भाषा में समझाकर जागरूक करने का प्रयास करता है तो राजनीती के गलियारों में खलबली मच जाती है। जनता की समझ को सीमित रखने में अंग्रेजी भाषा का भी अहम् योगदान है। सभी अहम् जानकारियाँ अदालतों के फैसले अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो पाते हैं। अब आम जनता को अपनी मातृभाषा तक में पढ़ने का सही मौका नहीं मिल पा रहा तो फिर अंग्रेजी सीखने -सिखाने की  किसे फिक्र है?  केजरीवाल ने जो शुरुआत की है वो बिलकुल सही है। परन्तु कुछ कमियां भी हैं।  जैसे - मीडिया से रुबरु होने वाले प्रवक्ता कई बार भावावेश में आकर ऐसी बात कह जाते हैं जिससे विरोधियों के निशाने पर आ जाते हैं, कोई भी प्रवक्ता कभी भी कुछ भी बोल देता है फिर बाद में माफ़ी माँग लेता है , आंदोलन में शामिल लोगों के बिजली के बिलों में आधी कटौती करने का फैसला भी गलत है, क्योंकि पार्टी को वोट तो लाखों ने दिया था फिर सबके बिलों में कटौती होनी चाहिए थी। दिल्ली  यूनिवर्सिटी में दिल्ली के स्टूडेंट्स को आरक्षण का फैसला भी सही नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ऐसे कदम से पार्टी की राष्ट्रीय  सोच प्रकट नहीं होती है। सभी अस्थायी कर्मियों को तुरंत स्थायी करने का आश्वासन देना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दिल्ली के स्कूलों में कार्य के घंटे बढ़ाने का कदम भी उचित नहीं कहा जा सकता। हालाँकि RTE. में इसका प्रावधान है ऐसा कहा जाता है। लेकिन ज़रूरी यह है कि सरकारी स्कूलों में भी पब्लिक स्कूल जैसी सुविधाओं की  उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाए।

काम के घंटे बढ़ाना  समस्या का  समाधान नहीं है।  इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। मानसिक थकान ज्यादा होने से उनकी रचनात्मक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इन सब बातों का ध्यान केजरीवाल को भविष्य में रखना चाहिए। इस्तीफा देने के बाद इन बातों पर गौर करना बहुत ज़रूरी है कि आप राजनीती में थोड़ी चाणक्यनीति भी मिलाये और ऐसे लोगों को पार्टी का प्रवक्ता बनाये जोकि तर्क देने में ,बोलने में माहिर हों , भाषण शैली प्रभावशाली हो। जिनके बोलने में धाराप्रवाहिता हो ,जोश हो। जिनकी भाषा पैनी हो।

 यह सब गुण भी टिके रहने और अपना काम ईमानदारी से करने के लिए ज़रूरी हैं।बोलने की  कला में ही BSP. उत्तर प्रदेश  में पीछे रह गई  हज़ारों बेघरों को मकान देने, अपराधियों पर लगाम लगाने के बावजूद  मूर्तियां बनवाने का मुद्दा विरोधियों ने  खूब उछाल दिया और BSP. के नेता सही जवाब नहीं दे पाये। और   मात्र लैपटॉप का वादा करके सपा ने अपनी सरकार  बना ली।

 अरविंदजी , आपका इस्तीफ़ा देने का फैसला बिलकुल  सही है। समर्थन की  बैसाखी से जनलोकपाल का एवरेस्ट फतह नहीं किया जा सकता। 

भविष्य की सफलताओं के लिए मेरी शुभकामनाएं